Rashtra Sevika Samiti is an RSS inspired nationalist women’s organisation founded on Vijayadashami Day on October 25, 1936 at Wardhah. Today, Rashtra Sevika Samiti is considered to be the largest social organisation in the world, of the woman, for the women, by the woman.

Rashtra Sevika Samiti (National Women Volunteers Committee) is a Hindu nationalist women’s organisation inspired by RSS. Even though it is often referred to as the “women’s wing” of the RSS,the organisation is independent of the RSS while sharing its ideology. Membership and leadership is restricted to women and its activities are directed to nationalist devotion and mobilisation of Hindu or Bharatiya women.

Rashtra Sevika Samiti

Rashtra Sevika Samiti

The current Chief (Sanskrit: Pramukh Sanchalika) of the Samiti is V Shantha Kumari (referred to informally as “Shanthakka”) and its General Secretary (Pramukh Karyavahika) is Sita Annadanam.

Laxmibai Kelkar, founder of Rashtra Sevika Samiti. 

V Shantha Kumari, present Chief or Pramukh Sanchalika of Rashtra Sevika Samiti. 

Laxmibai Kelkar was the founder of the Rashtra Sevika Samiti. Before establishing the organization, Kelkar visited Dr. Keshava Baliram Hedgewar, the founder of the RSS, in 1936, later Laxmibai Kelkar established the Rashtra Sevika Samiti at Wardha on 25 October 1936.

Rashtra Sevika Samiti is today the largest Hindu women’s organization working to uphold Indian culture and traditions. RSS women are actively involved in socio-cultural activities. Samiti inculcates a sense of patriotism and social awareness in people. Various types of training camps at different levels in all parts of India are conducted periodically.

Active Shakhas (local branches with regular gatherings of members where they practice yoga, sing nationalist/patriotic songs, military training and have discussions) of the Samiti currently operate in 5215 centers. 875 centers conduct the Shakhas on a daily basis. The estimates of active membership range from 100,000 to 1 million It has overseas branches in 10 countries, which use the name Hindu Sevika Samiti.

Rashtra Sevika Samiti also runs 475 service projects all over India for the poor and underprivileged, without regard to religion, caste, creed, sect, gender, or ethnicity. These include schools, libraries, computer training centers and orphanages.

Rashtra Sevika Samiti focuses on Hindu women’s role in the society as leaders and agents of positive social reform. Samiti teaches its members three ideals;

  1. Matrutva (Universal Motherhood)
  2. Kartrutva (Efficiency and Social Activism)
  3. Netrutva (Leadership)

The organization believes that all women have the capability to create a positive change in their community.

AllSanchalika

 

राष्ट्र सेविका समिति – संक्षेप में परिचय

नारी ही स्वयं प्रकृति है, सृष्टी की आद्य शक्ति है। इस संपूर्ण चराचर जगत् में जहाँ भी जो कुछ दिखाई देता है, वह उसी आद्याशक्ति की प्रभा से आभासित है, अत: चैतन्यमय है। इस आद्याशक्ति को हम महालक्ष्मी, महासरस्वती, महाकाली और उस परब्रह्म की शक्ति के रुप में मानते है। प्रत्येक स्त्री उस शक्तितत्त्व का अंश है इस संकल्पना से प्रेरणा लेकर भारतिय संस्कृति प्रवाहीत हुई।

भारतिय समाज रचना का ताना बाना ब्रह्ममयी चैतन्य शक्ति के अंशरूप नारी अस्तित्त्व से चारो तरफ बुना हुआ दिखाई देता है। गीता में भगवान श्री कृष्ण ने समाज धारणा के लिए नारी की सुप्त शक्तियोंको आधार रूप माना है। हम देखते है की प्रत्येक कार्य में शक्ति आंतरनिहीत होती है। उस शक्ति का जागरण करते हुए, शक्ति को संघटित करते हुए, उसे राष्ट्र निर्माण कार्य में लगाने का विलक्षण ध्येय अधुनिक ऋषिका वं. मौसीजी ने अपने सामने रखा और उस उद्देश की पूर्ति हेतू राष्ट्र सेविका समिति की स्थापना की।

स्थापना – १९३६, विजयादशमी
स्थान – वर्धा
संस्थापिका / आद्य प्रमुख संचालिका – वं.स्व. श्रीमती लक्ष्मीबाई केळकर (मौसीजी) 
विद्यमान प्रमुख संचालिका – वं. शांतक्का
समिति का ध्येय – तेजस्वी राष्ट्रनिर्मिती
सूत्र – स्त्री राष्ट्र की आधारशीला है।

कार्यक्रम

  • दैनंदिन तथा साप्ताहिक शाखाएँ लगाना वहां पर सेविकाओंको शारीरिक शिक्षा, बौद्धिक विकास, मनोबल बढाने के लिये विविध उपक्रम शुरू करना।
  • प्रतिवर्ष भारतीय तथा विभाग बैठकों आयोजन शिशु-बालिका, युवती, गृहिणी सेविकाओंके लिये।
  • वनविहार और शिबीरोंका आयोजन – शिशु, बालिका और गृहीणी सेविकाओं के लिए।
  • अखिल भारतीय तथा प्रांत, विभाग स्तरोंपर प्रसंगोत्पात संमेलन लेना।
  • अपनत्व की भावना से आरोग्य शिबिर, छात्रावास, उद्योग मंदिर, बालमंदिर संस्कार वर्ग सहित विभिन्न सेवाकार्य करना।
  • विश्व विभाग में हिंदुत्व का प्रसार तथा हिंदु बांधवोंका संघठन
  • १९४२ से लेकर रामजन्मभूमि आंदोलन, जम्मू कश्मिर बचाओ अभियान इत्यदी राष्ट्रीय कार्यों में महत्त्वपूर्ण सहभागिता देना।

राष्ट्रीय उत्सव

  • वर्ष प्रतिपदा(चैत्र शुक्ल प्रतिपदा)
  • गुरू पौर्णिमा(आषाढ पौर्णिमा)
  • रक्षाबंधन(श्रावण पौर्णिमा)
  • विजयादशमी(आश्विन शुक्ल दशमी)
  • मकर संक्रमण(१४ जनवरी)

इतिहास

हम भारतवासी भाग्यवान है। हमें उज्जवल इतिहास और परंपरा है। राष्ट्र तथा विश्वकल्याण हेतु ऋषिमुनियोंका qचतन है। उस qचतन को प्रत्यक्ष में लाने के लिय नीतिनियम, व्रत,त्योहारोंका आयोजन है। निसर्ग आर भारतीय मानव जीवन एक दूसरे के सहयोग से चलता आया है। ज्योतिष्य,खगोल,ज्ञानविज्ञान, गणित, नौकानयन, शिल्पशास्त्र, आदि शास्त्रों के मूलतत्वों का किया गया अभ्यास है। संगीत, नृत्य,बुनकाम,चित्ररेखन जैसी कलाओं में हमनें निपुणता पायी है। सृष्टिनिर्माण कैसे हुआ? हरेक व्यक्ती का जीवनकार्य क्याहै? इसका विचार हुआ है। आत्मा की चिरंतनता का बोध, व्यष्टि, समष्टि, सृष्टि, परमेष्टि इस आवश्यक विकासक्रम का ज्ञान, समाज सुचारू रूप से चले गये इसलिये qचतक, शिक्षक, रक्षक, वणिक तथा सेवक इन चार वर्गोंका विचार, व्यक्ति और समाज में योग्य क्रियान्वयन रहे इस कारण चार आश्रमों की व्यवस्था आदि कई बातें हमनें धरोहररूप में पायी है। राम, कृष्ण, बुद्ध जिन जैसे कई राष्ट्र पुरूषों का जीवन, उन्होंने स्थापित किये विविध विचार और आदर्श हमारें सामने है। परिस्थितीवश निर्माण हुई कई विचारधाराएँ विविध दर्शनोंके रूप में हम पाते है। राष्ट्र कल्याण तथा गौरव हेतु जीवन अर्पण करनेवाले वीर, समाज कर्तव्य प्रेरित करनेवाली महिलाएँ, इन चरित्रों से हमारे इतिहास के पन्ने गौरवान्वित हुएँ है।
इस विस्मृत धरोहर का ज्ञान त्रपर से करा देना, बदलते काल और परिस्थितीमें जो अयोग्य या कालबाह्य सिद्ध हुआहै उसका त्याग, अन्य राष्ट्रों जो अच्छा है उसका स्वीकार, भौतिक विकास के साथ-साथ अध्यात्मिक qचतन, हमारे प्राचीन साहित्य कमा अभ्यास और उसमें प्रेरणा निर्माण करनेवाले रूप को और कथाओं का विश्लेषण, भारत एक जगद्वंद्य राष्ट्र बने इसलिये प्रयास यह सब मेरा कर्तव्य है इस भाव से प्रेरित व्यक्तियों का निर्माण आदि सभी कार्यो में नारी शक्ति का योगदान महत्वपूर्ण रहता आया है। आज भी है और कल भी रहेगा यह विश्वास राष्ट्र सेविका समिति महिलाओं में निर्माण कर रही है।
वास्तव में यह कोई नया कार्य नही है। सदियोंसे चलता आया दायित्व है। संक्रमण काल में व्यस्तचित्तता के कारण यह कर्तव्य दृष्टि से बोझल हो गया था। अत: आवश्यकता वा यह शक्तिजागरण शुरू हुआ है। यह भारतीय मूलाधार पर ही हो रहा है। महात्मा गांधी जी ने कहाँ है,‘हम नये विचारोंका आलंबन अवश्य करेंगे। नये अक्षर लिखेंगेलेकिन जिसपर लिखना है वह आधार हमारा ही होगा।ङ्कभारत का मूलाधार है हिंदुत्व। वही भारत का राष्ट्रीयत्व है। हिंदुत्व यहीं राष्ट्रीयत्व है यह तत्व राष्ट्र सेविका समिति द्वारा विकसित हो रहा है।
संस्कार निर्माण से माता का स्थान महत्वपूर्ण है। प्रथम है, ‘मातृदेवो भवङ्क। तद्नंतर ‘पितृदेवे भवङ्क,‘आचार्यदेवो भवङ्क। कुछ संस्कार जन्मजात होते है, कुछ प्रयत्नपूर्वक किये जाते है। अनुकरणप्रिय मानव, समाजवंद्य लोगोंके जीवन से, कृति स, विचारों से संस्कार गअहण करता है। समाज में पर्याप्त संख्या में संस्कारित व्यक्ति रहे यह प्रयास प्राचीन काल से भारत करता आया है। संत ज्ञानेश्वर ने कहां है,‘वर्षत सकळ मंगळी। ईश्वरनिष्ठांची मांदियाळी। अनवरत भूमंडळी भेटतु तया भूताङ्क। हमेशा कल्याण का वर्षाव करनेवाला समूह समाज में सदा विचरता रहे। सामान्य लोगों को विनाप्रयास उसकी भेट हो। आदर्शभूत एक नहीं अनेक व्यक्ति समाज में रहे। व्यक्तिगत मोक्ष या ज्ञानपिपासा में वे बद्ध न होंगे। समाज में सभी से मलिते-जुलते रहेंगे तब संस्कारों का कार्य विनाप्रयास आपने ही आप होगा। राष्ट्र सेविका समिति की संस्थापिका तथा प्रथम प्रमुख संचालिका वं. लक्ष्मीबाई केलकर ने यहीं सोचा। स्वयं के जीवन से, विविध कृतियों से सेविका ओं के सामने उदाहरण प्रस्तुत किया। ‘एकोऽहं बहु स्याम्ङ्क की तरह आज प्रचारिकायें और प्रवासी कार्यकर्ती बहने अपने कार्य से समाजमन में प्र्रेरणा निर्माण कर रही है।
कुछ संस्कार निर्माण करने पडते है। जैसे कि जिजामाता ने, विदुला ने कथा कहानियां के माध्यम से किये। यह ध्यान में रखते हुए राष्ट्र सेविका समिति यह कार्य साहित्य निर्माण, विविध कार्यक्रम, बौद्धिक, चर्चा,सेवाकार्यों के द्वाराकर रही है। विविध समाजक्षेत्रों में वह कार्यरत है।भारत के अधिकांश तहसीलों में शाखाएँ है। ३४५ सेवाकार्य चल रहे है। १५ शैक्षणिक प्रकल्प है। भारत की सभी भाषाओं में सााहत्यि प्रकाशित हो रहा है। विविध प्रकार का सांस्कृतिक कार्य चल रहा है।भारत के बाहर २२ देशोंमें कार्य है।
हरेक व्यक्ति में ईश्वर का अंश है। सभी समान है इस विचार का प्रत्यक्ष दर्शन समितिकार्य में होता है। वर्ग जाति, संपत्ति के विचारसे भेद नहीं होता। आवश्यकतावश उन्नतीनुसार एकश; संपत्ति है। इसी विचार से समाज समाज में चलनेवालेसमाजोपयोगी अन्य कार्य, संस्था, संगठन क प्रति योग्य आदरभाव है।सब मिलकर आगे बढना है। यह विचार है। मूल प्रेरणा कल्याणकारी हो और कार्य विधायक हो यह आग्रह है। सकारात्मक दृष्टि रहे यह प्रयास है। अधिकारोंका संयम,व्यक्तियोंका सम्मान है। तत्व अडिग है। व्यवहार लचिला है। स्वदेशी भाव का पालन है। सुदृढ, स्वाभिमानयुक्त, सुसंस्कारित, संगठित नारीशक्ति से भावी भारत निश्चित ही तेजस्वी बनेगा।
सन १९०५ में बंगाल का विभाजन हुआ। उसका विरोध करने के लिये केवल बंगाल नहीं तो समुचा भारत सज्ज हो उठा। वंदे मातरम् यह मंत्र सभी को प्रेरणा देने लगा। स्वदेशी का आंदोलन प्रखर होता गया। परिणामत: अंग्रेज शासन को विभाजन का वह आदेश वापस लेना पडा। फिर भी डिसेंबर १९११ को पंचम जॉर्ज के दरबार में कई राजा महाराजा और रईस लोग विनम्र भाव से संमिलित हुए। थे।
जुलै १९१४ में प्रथम विश्वयुद्ध शुरू हुआ। १८८५ में राष्ट्रीय काँग्रेस की स्थापना हुई थी। कार्य बढ रहा था। फिर भी स्वतंत्रता संघर्ष समाज के सभी स्तरों तक पहुँचा नहीं था। इस युद्ध में भी तथाकथित उच्च वर्ग ने अंग्रेजी की सहायता की। १९१७ में होमरूल लीग की कल्पना लोगों के सामने रखी गयी। लो. तिलक की चतु: सूत्रीने स्वराज्य,स्वदेशी और राष्ट्रीय शिक्षा ने सभी को आकर्षित किया था।अंग्रेजोंने लो. तिलक को उपाधि प्रदान की तेली तांबोली लोगों का नेता। अर्थ स्पष्ट था स्वतंत्रता संर्गे समाज के सभी स्तरो तक पहुँच रहा था। लो. तिलक के स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध हक्क है। इस qसहनाद से सारी तरूणाई त्यागार्थसिद्ध हुर्स और सर्व समाज जागृत हो उठा। १९१८ में विश्वयुद्ध समाप्ती के बाद अंग्रजों द्वारा मनाये जानेवाले विजयोत्सव को अंग्रजों को अपेक्षित प्रतिसाद प्राप्त नही हुआ। १९१९ में माँटेग्यू चेम्सफर्डसुधार के साथ-साथ भारतीयोंके संचार और भाषण स्वातंत्र्य दबाने *रौलट अॅ१क्ट* भी संमत हुआ। उसका विरोध होने लगा। अत्याचारी शासन ने जालियनवाला बाग हत्याकांड रच डाला। उसका गहन असर सभी पर हुआ था।
१९२० अगस्त में लो. तिलक की मृत्यु हुई। गांधीजी स्वतंत्रता संघर्ष के नेता बने। धीरे धीरे इस संघर्ष में महिलाओंका का सहभाग बढने लगा। किन्तु १९२४ मेंहिंदु और मुस्लिमों के दंगे शुरू हुए। १९२६ में हिंदु संगठन का मंत्र देनेवाले स्वामी श्रद्धानंद की रशीद नामक एक मुस्लिम ने हत्या कर दी। १९२५ की एक महत्वपूर्ण घटना थी राष्ट्रीय स्वयं सेवकसंघ का प्रारंभ। १९२८ सायमन कमिशन का विरोध करनेवाला लाला लजपतराय की मृत्यु अंग्रजोंके अत्याचार के कारण हुई। १९३० संपूर्ण स्वातंत्र्य की घोषणा – दांडी यात्रा, कानूनभंग आंदोलन से गुंज उठा। सभी कार्यक्रमों में महिलाओं का सहभाग बढता रहा। नागपूर काँग्रेस की अध्यक्षा १९३० में थी अनसूयाबाई काळे । प्रभातफेरियाँ, पिकेqटग आदि कार्यक्रमों में महिलाएँ सहयोग देने लगी।
क्रांतिकारक  १९०८  से ही सक्रिय हो चुके थे। इस आंदोलन मे सुशीलादीदी, दुर्गाभाभी आदि महिलाएँ कार्यरत थी। परिणामत: जगह जगह महिलाओंने राष्ट्रकार्य में अपनी जिम्मेदारी निभाने का कार्य शुरू किया था।
जुलै १९०५ में जन्मी वं लक्ष्मीबाई केलकर ने वातावरण से स्वतंत्रता संस्कार ग्रहण किये थे। बढती आयु में सभी घटनाओंका विचार शुरू हुआ। काँग्रेस के आंदोलन में सहभाग भी रहा। qचतन चल ही रहा था। पिकेqटग के समय अनुभव हुआ कि महिलाओंके योग्य सम्मान नहीं मिल रहा है। साथ ही साथ नेता तथा कार्यकर्ता गण भी स्त्रियां अपने कंधें से कंधा लगातें चले यहीं नहीं चाहते थे। नागपुर के संत्रा मार्केट में महिलाओंको मजबुरी से अनिच्छा से दलालों को देह समर्पित करना पडता था। स्त्री का देह मानो एक चलन बन गया था। सर्वसामान्य स्त्री घर की चारदिवारी में बंद थी। स्त्री शिक्षा प्राप्त कर रहीं थी किन्तु नासमझ में पडी थी। प्राप्त परिस्थिती में दायित्व क्या है? उसे कैसे निभाना है? विचारतो शुरू हुआ था। मार्ग नहीं मिल नही रहा था। समोचारपत्रों का वाचन और चर्चा शुरू हुई थी। इन सभी प्रयत्नों को एक सूत्र में गूंथना और योग्य दिशा देना जरूरी था।
ऐसे विचारतरंगों पर वं. मौसीजी हिलोरे ले रहीं थी। और एक तिनका हाथ आया। महिलाओंने सीता बनना चाहाँ। कैसी सीता? वनवास के कष्टोंको सहने की मानसिकता रखनेवाली निडर सीतारावण के पकड में जकडी होते हुए भी प्रसंगावधशन रख अपने गहने फेंकनेवाली सीता। अशोकवन की क्रूर राक्षसियोंको भी अपनी सहकारी बनानेवाली। रावण के डाँटों से जरा भी विचलित न होनेवाली, श्रीराम के पराक्रमों को प्रेरणा देनेवाली। बस निश्चय हुआ। स्वसंरक्षणक्षम, शारीरिक, मानसिक बौद्धिक दृष्टी से सक्षम स्त्री निर्माण करना। उसके विस्तृत सामथ्र्य को जगाना।
किन्तु कैसे? विचार कृति में परिवर्तित करने पडेंगे। और रा. स्व. संघ का प्रतिदिन का कार्य सामने आया। पू. डॉ. हेडगेवारजी, मा. अप्पाजीइनसे चर्चा हुई। सीताचरित्र अभ्यास के लिये रामायण का अभ्यास शुरू था। हिंदुत्व संबंधी विचार स्वातंत्र्यवीर सावरकर जी के साहित्य के qचतन से पक्क हुए। संगठन संबंधी मार्गदर्शन समर्त रामदासजी के विचारोंसे मिला। और प्रत्यक्ष सहयोग मिला डॉ. हेडगेवार जी का। विजयादशमी १९३६ के सुमुहूर्त पर राष्ट्र सेविका समिति की प्रथम शाखा वर्धा में प्रारंभ हुई।
वर्धा से प्रवाहित गंगा
ब्रिटिशोंके माध्यम से भारत का फिर एक बार विश्व से संपर्क बढा। वैज्ञानिक विकास के कारण ब्रिटिशोंने प्राप्त की भौतिक सुविधायें जो लोककल्याण हेतु नहीं, शासन सुव्यस्थित चले इस दृष्टि से भी क्यों न हो- रेल,पोस्ट जैसी सुविधायें भारतीयोंको प्राप्त हुई। इन सारी बातों से चकाचौंध भारतीयों को धीरे धीरे अंग्रजोंद्वारा होनेवाला अन्याय, अत्याचार, धनशोषण का पता चलने लगा और निद्रित qसह जाग उठा। स्वतंत्रता, संघर्ष, क्रांतिकारकों का त्याग आदि से महिलायें भी सजग हुई। वर्धा, भंडारा, सातारा और पुणे में कार्य शुरू हुआ। १९३६ में राष्ट्र सेविका समिति की स्थापना होने के बाद सारे झरने समिति में जा मिले और प्रवाह बहने लगा।  स्वाभाविक ही प्रथम विदर्भ को सुफलित करते हुए आगे बढा।
महाराष्ट्र
पुणे में वं सरस्वती आपटे ने काम शुरू किया ही था। १९३८ में मौसी जी से भेंट होने पर उन्होंने अपना काम समितिकार्य में विलीन किया। मुंबई मे सुप्रसिद्ध लेखिका और कवयित्री योगिनीताई जोगळेकर ने नायगाव में शाखा शुरू की। १९४८ में qसध से आयी हुई बहने ठाणे शिक्षा वर्ग में उपस्थित थी। नाशिक में राणी लक्ष्मीबाई स्मारक समिति के द्वारा राणी लक्ष्मीबाई भवन यह समिति का प्रथम भवन निर्माण हुआ १९५८ में । प्रथम घोष प्रशिक्षण वर्ग भी १९६६ में यही हुआ।
अकोला में १९३८ में काम प्रारंभ हुआ। यहीं की एक सेविका मा. qसधुताई ने आगे चलकर प्रथम प्रचारिका के नाते कार्य समूचे उत्तरी क्षेत्र में फैलाया। अमरावती की लीला ताटके विवाह के बाद उज्जैन गयी और वहाँ कार्य शुरू हुआ।
१९३९ के अंत में महाराष्ट्र की चारो दिशाओंमें शाखाएँ स्थापित हुई थी। १९४० में पुणे में प्रमुख कार्यकर्ती बहनों की बैठक हुई। काकू परांजपे,नागपुर विभाग प्रमुख नियुक्त हुई। हर साल ऐसी बैठक लेने का निर्णय भी हुआ। १९४१ में वं. मौसी जी पंढरपुर गयी थी देवदर्शन के लिये। फिर भी वहाँ भी एक बैठक हुई।
मध्य प्रदेश
१९३८ में उज्जैन में शाखा शुरू हुई। १९४१ में इंदुर में मैनाताई ने कार्य प्रारंभ किया। महाराष्ट्र की और कन्याएँ विवाह होकर मध्य प्रदेश आयी और जबलपूर सागर, रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग यहां कार्य प्रारंभ हुआ। मा. ताई अंबर्डेकर ने १९४३ से प्रवास करना प्रारंभ किया और कार्य बढा। १९४५ में ताई जी ने मध्यप्रदेश की कार्यवाहकिा का दायित्व संभाला। इंदुर, ग्वाल्हेर भोपाल,देवास आदि संस्थानों में कार्य बढता रहा।
गुजरात
१९४२ में पुणे की एक सेविका अतिथिरूपी कर्णावती आयी। पुणें में हररोज सायंकाल शाखा में जाने की आदत ने उसे मजबुर किया और शाखा प्रारंभ हुई। बहुतांश लोग व्यापारी होने के कारण सुखासीन और रूढिप्रिय थे। बालिकाओंके प्रवृत्ति घर स बाहर निकलने की नहीं थी। फिर भी यह पौंधा धीरे-धीरे अपनी जडें दृढ करता रहा। शिक्षा वर्ग के लिये यहां की सेविकाएँ महाराष्ट्र में जाती थी। अब महाराष्ट्र के वर्गो में यह आवश्यक होने लगा कि बौद्धिक, चर्चा के विषय रात के समय गुजरात, मध्य भारत,पंजाब, qसध की बहनों को हिंदी में समझाना। सौराष्ट्र और कच्छ में भी कार्य का प्रसार हुआ।
आंध्र प्रदेश
१९४७ में सोलापुर से माई अफजलपुरकर भाग्यनगर आयी। काम प्रारंभ हुआ। मुस्लिम प्रभावित प्रांत हुए भी नयी बहनें कार्य बढानें मिलती और काम अग्रेसर होता रहा।
सिंध
१९४३ में यहां कुछ बहने नागपुर के शिक्षा वर्ग में संमिलित हुई। वापस आने के बाद काम शुरू हुआ। दस शाखाएँ चलने लगी। कार्य जोर शोर से शुरू हुआ। १९४७ में जब वं. मौसी जी कराची में गयी तब १२०० सेविकाएँ रात के समय भयावह परिस्थिती में भी उपस्थित रही। इसीसे पता चलता है कि,काम कितना बढा था। दुर्भाग्यवश qसध पाकिस्तान में चला गया। विस्थापित होने के बाद भी कुछ सेविकाएँ कार्य से जुडी रही। qसध की सौ बहनों की, मुंबईकी सेविकाओंने, उनकी व्यवस्थश होने तक लगभग एक साल अपने गरों में व्यवस्था की थी। ठाणे वर्ग पर बीस qसधी सेविकाएँ संमिलित थी।
१९३६ से १९४ तक केवल ग्यारह वर्ष के कालखंड में पुरा महाराष्ट्र, सिंध, मध्य प्रदेश,आंध्र, गुजराथ,समितिकार्य से व्याप्त हुए। कर्नाटक के सीमावर्ती भागों में भी कार्य शुरू हुआ था। कुल मिलाकर २४० स्थानों पर दैनंदिन शाखाएँ थी। उनमें लगभग १३,००० बहनें उपस्थित थी। सभी वयोगट होने के कारण शाखा पर शिशु, अरूण, प्रौढ ऐसे चार गण  रहते थे।

कर्नाटक
१९४७ में बेलगांव में काम शुरू हुआ। कर्नाटक-महाराष्ट्र सीमा पर बसा हुआ यह शहर। स्वाभाविक ही कार्यकर्ताओं को कन्नड भाषा सीखनीं पडीं। महाराष्ट्रीय और कन्नड महिला एक ही शाखामें यह चित्र दीखने लगा। १९४८ में बंगलोर,धीरे-धीरे धारवाड, कुंदगोल आदि स्थानों पर काम बढा। कन्नड मराठी संघर्ष जोरशेर से शुरा हुआ था। लेकिन शाखा पर उसका कुछ भी प्रभाव नहीं पडा। १९६७ में वं. मौसी जी का वहां प्रवास हुआ।
तामिलनाडू
१९६८ में मा. qसधुताई फाटक किसी कारणवश वहां गयी थी। तब उन्होंने महिलाओं की बैंठक ली।   पाच दिन का शिबिर लगा। कार्य की जानकारी प्राप्त हुई और मद्रास में काम प्रारंभ हुआ। प्रथमवर्ग में मा. प्रमिलाताई मुंजे उपस्थित थी।
केरळ
शायद भाषागत समस्या के कारण यहाँ काम प्रारंभ होन में देर हुई। १९७५ में मा. कुसुमताई साठे जी का प्रवास तय हुआ। अंग्रेजी में बातचीत करनी पडी।  बौद्धिक वर्ग तथा परस्पर वार्तालाप के लिये कई बार दुभाqषओंका माध्यम स्वीकारना पडा। धारवाड से शिक्षिकाएँ बुलाकर पालघाट में पंधरा दिन का वर्ग होने के बाद कार्य प्रारंभ होने ही लगा कि आपात्काल ने वह प्रभावित कर दिया। फिर भी पत्र द्वारा संपर्क होता रहा। १९७८ के नागपुर के वर्ग में १३ सेविकाएँ संमिलित हुई। वे वापस जाने के बाद कार्य बढता रहा।
बिहार
भारत की पूर्व दिशा में पहुँचने के लिये समिति को जरा ज्यादा समय लगा। बिहार में स्त्रियाएँ कुछ सामाजिक कार्य करें यह मानसिकता आज भी कम है। उस समय की बात ही क्या? १९६५ में पटना गयी हुई वनिता आठवले इस विवाहित सेविका ने १५ दिन का शिक्षावर्ग लगाया। उनके निरंतर प्रवास से काम बढता गयां।
उडिसा
पति के नोकरी के कारण गयी हुई एक सेविका ने यहां साधारणतया १९६६-६७  में कार्य प्रारंभ किया। काम धीमी गति से बढा। अधिकारियोंका प्रवास होता रहा। फिर भी विस्तारिका की आवश्यकता थी। महिलाओंके लिये घर से बाहर कुछ दिन समिति कार्य के लिये रहना उससमय कठिन था। फिर भी मध्य प्रदेश की एक गृहिणी ने यह जिम्मेदारी संभाली और कार्य गतिशील बना।
बंगाल
१९६८ में सांगली की एक सेविका कलकत्ता पहुंची। मैदान का अभाव और नक्षलवादियों का प्रभाव! तनावपूर्ण वातावरण! बालिकाओं और महिलाओं को बाहर कैसे भेजे? काम प्रारंभ करना कठिन था। qकतु जिद्द और नियोजन से सफलता मिलने लगी।
असम
बंगाल से सभी अधिक तनाववाला वातावरण। qकतुएक आशा का किरण था। यहां की महिलाएँ स्वतंत्र है। फिर भी ऐसी सुदूर क्षेत्र में पहुँचना कार्यकर्ताओंके अभाव के कारण कठिन था। वहाँ की कुछ बहनों को नियोजन से कानपुर वर्ग में १९६८ में बुलाया गया और कार्य का सूत्रपात हुआ। १९७०, १९७९ में अधिकारी प्रवास, नागपुर से भेजी गयी दो तीन विस्तारिकाएँ इनके सहयोग से काम बढा।
दिल्ली
१९४७ में दिल्ली पहुंची मा. काकू परांजपे ने प्रयास किया। योजना से महाराष्ट्र की दो तीन सेविकाएँ की शादी भी दिल्लीस्थित युवकोंसे की गयी। फिर भी वहाँ कार्य ने मूल नहीं पकडा और १९५१ में काकू की मृत्यु हुई। लेकिन प्रयास चलते ही रहें और १९५७-५८ में मा. qसधुताई की यहां योजना हुई और १९६० से कार्य दृढता से चल रहा है।
राजस्थान
मा. qसधुताई को राजस्थान का भी दायित्व दिया था। उनका कार्य राजस्थान में १९६१ में शुरू हुआ। दिल्ली वर्गो में कुछ सेविकाएँ संमिलित होने लगी। तब से आज तक कार्य लगातार चल रहा है।  यहां भी महिलाएँ शिक्षा प्राप्त कर कुछ करें ऐसी समाज की मानसिकता नहीं थी।

पंजाब
पंचनदों के कारण उपजाऊँ बनी यह भुमी। विदेशी आक्रमणोंसे सदैव जुझना पडा। अशांतता में सांस्कृतिक कार्य पनपना कठिन रहता है। १९५८ में प्रारंभ हुआ यहां का कार्य गतिशील नही हो रहा था।  १९८० में यहांं पति के नोकरी के कारण पुणे से एक सेविका आयी । उसने उस मुरझे पौधे को पुनरूज्जीवित किया। १९८४ में यह प्रांत फिर समस्यायुक्त बना। अत: पौधा बहोत तरोताजा तो नही हुआ। लेकिन मुरझाया भी नहीं। अधिकारियोंका प्रवास, विस्तारिकाओंका कार्य उसे ताजा रखनें में सफल है।
हिमाचल
१९४७ में नागपुर के शिक्षावर्ग के लिये यहाँ से १५ बहने आयी थी। उन्होंने उसके पूर्व शुरू हुआ कार्य बढाया। मा. qसधुताईजी ने भी बार-बार प्रवास किया। जनसंख्या मे केवल पांच प्रतिशत हिंदु होते हुए भी उधमपुर, किश्तवाड आदि स्थानों पर काम चल रहा है।
जम्मू- यहां एक कार्यालय और एक छात्रावास भी है।
हरियाणा
१९६२ में यह प्रांत बना तब से कार्य शुरू है। अंबाला, कर्नाल,पानीपत आदि स्थानों पर कार्य चल रहां है।
उत्तर प्रदेश
सामाजिक कार्य करने की प्रवृत्ति कम होने के कारण दिल्ली के साथ शुरू हुआ कार्य धीमी गति से बढा। १९७७ में वं. उषातार्स जी के प्रांत प्रवास से उसकी गति बढी। आज सारे जिलों तक तथा कुछ तहसीलों तक कार्य पहुंचा है
इस तरह १९७८ तक अर्थात वं मौसी जी के जीवनकाल में ही समितिकार्य संपूर्ण भारत में पैला हुआ था। अर्थात कभी कभी विपरीत परिस्थिती का सामना भी करना पडा। स्वतंत्रता प्राप्ती के बाद हुई शिथिलता, महात्माजी के वध के बाद हुआ कार्य, अन्यान्य प्रांतों की झेलनी पडी प्राकृतिक आपदायें,१९६२ , ६५ और ७१ के युद्धोंके कारण संबंधित प्रांतों में आयी हुई अनिश्चितता, १९७५ से ७७ तक के आपात्काल में प्रकट कार्य करने की कठिनार्इं जैसी विपदाओं का सामना करते हुए भी काम आगे बढता रहा। आज भी जम्मू काश्मीर, असम जैसे आतंकवाद से ग्रस्त क्षेत्रोंमें भी काम बढ रहा है यह  निश्चित ही गौरवास्पद है।
एक और बात उल्लेखनीय है की शादी होकर या पति के तबादले के कारण अन्य स्थानों में गयी हुई सेविकाओं ने कार्य अन्यान्य जगहोंपर प्रारंभ किया है। महिला ने सामाजिक कार्य करना, स्वतंत्र रूप से प्रवास करना, घर घर जाकर संपर्क करना,भाषण देना, खुली जगह में व्यायाम करना, या खेलना, जातपात का विचार नहीं करना आदि से समाज को अभ्यस्तकरना पहा। समाज की मानसिकता बदलनी पडी। प्रथमत: तो महिलाएँ संघटन कर सकती है यह भी विश्वास नहीं था।
समाज की मानसिकता बदली औैर कार्यप्रसार के लिये विस्तारिकाएँ निकलने लगी। समिति के बाद अन्य संस्था संघटनों में प्रचारिकाएँ निकलती गयी। देश के राज्यों में प्रांतप्रचारिकाएँ कार्यरत है। कुल शाखाएँ ४९०० है।
इस भौगोलिक क्षेत्रविस्तार के साथ समिति कार्य में विविध आयाम जोडे गयें।

1.संस्थापिका एवं आद्य प्रमुख संचालिका वं. मौसीजी: वह समर्थ महिला कौन थी, जिसने केवल भारत में ही नही अपितु पूरे विश्वभर के विभिन्न देशों में रहनेवाली सैकडों-हजारो महिलाओं में हिन्दुत्व की भावना की ज्योति जगाकर उन्हें संगठन का महान मंत्र पढाया है। उस अलौकिक व्यक्तित्व का जीवन कैसा रहा होगा, जिसने मातृशक्ति को राष्ट्रकार्य के लिए प्रेरित किया और साकार हुआ एक विश्वव्यापी नारी संगठन जिसे आज विश्वभर में सम्मान की नजर से देखा जाता है।

2. वं. ताई आपटे (द्वितीय प्रमुख संचालिका): सतेजोऽस्तु नित्यं शांतपावित्र्यस्य दिव्य चारित्र्यस्य नंदादीपः। इसका साक्षात् रूप थी वंदनीय ताईजी (सरस्वतीबाई) आपटे राष्ट्र सेविका समिती की द्वितीय प्रमुख संचालिका। उनके रूप में ये पंक्तियाँ हमने न केवल देखी, अपितु उसका अनुभव किया। वं. ताईजीका जन्म कोकण में केळशी तहसील में आंजर्ले गांव फाल्गुन कृष्ण ११ इ. स. १९१० में हुआ। लो. तिलकजी उनके पिताजी के मामा थे। विरासत से राष्ट्रभक्ति का संस्कार लेकर आयी इस बालिका का नाम तापी अर्थात् तापहरण करनेवाली ऐसा रखा गया। ताईजी ने वह नाम सार्थ कर दिखाया। गोवा मुक्ति संग्राम और पानशेत बांध टूटने से आये प्रलय मे अपना संपूर्ण योगदान दिया प्रथम प्रमुख संचालिका लक्ष्मी व द्वितीय प्रमुख संचालिका सरस्वती याने लक्ष्मी और सरस्वती का अनोखा संगम राष्ट्र सेविका समिती के लिए बडे सौभाग्य की बात है। केवल अपने मायके और ससुराल के लोगों के लिए ही नही, अपितु सम्पर्क में आनेवाली हर व्यक्ति के लिए वह तापकारक शीतल ऐसी सिद्ध हुई। १५ वर्ष की आयु में तापी विद्वांस ने सरस्वती आपटे के रूप में पुणे में प्रवेश किया। एक पुत्र और दो कन्याओंने उनका जीवन परिपूर्ण बनाया।

3.वं. उषाताई चाटी (तृतिय प्रमुख संचालिका): ऋतुजा की प्रेममूर्ति – वं. उषाताई चाटी, हमारी तृतीय प्रमुख संचालिका। एक ऋजु, स्नेहमयी व्यक्तित्व। वं. उषाताई मूलतः भंडारा (विदर्भ) निवासी फणसे कुल की कन्या है। आपका जन्म ३१ अगस्त १९२७, तिथी भाद्रपद शुद्ध चतुर्थी याने गणेश चतुर्थी के दिन हुआ। बुद्धिदाता और गणों का नायकत्व करनेवाले गणपति का यह जन्मदिन और उसी अवसरपर आपका जन्म यह एक अद्भुत संजोग की बात है। उषाताई की पढाई भंडारा के मनरो हाईस्कूल में हुयी। वं. मौसीजी जिन्हे मातृतुल्य मानती थी ऐसी श्रीमती नानी कोलते की शाखा में उषाताई जाने लगी। उन के समर्पण भाव तथा निरपेक्षता का प्रभाव उषाताईपर हुआ।

4.वं. प्रमिलाताई मेढे (चतुर्थ प्रमुख संचालिका)

5. विद्यमान प्रमुख संचालिका: वं. शांता कुमारी (शांताक्का)

All Pramukh Sanchalikas of Rashtra Sevika Samiti

All Pramukh Sanchalikas of Rashtra Sevika Samiti

 

अभियान

समाज जागरण, समाज प्रबोधन और समाज संघटन ऐसे कार्योंमे समितिने अपनी अग्रेसरता हमेशा प्रगट की है| विभिन्न अभियान चलाये है| नारी शक्ति केवल रथपर विराज होने पर संतुष्ट नहीं है अपितु सारथ्य करने मे अपनी भूमिका निर्वाहन करे इस संकल्प से अभियान चलाये जाते है|

१९४२ के चले जाव आंदोलन में सहभाग। समिति का कार्य इतना स्थिर नही हुआ था कि इस आंदोलन में समिति समितिश: भाग लेगी। अत: सेविकाएँ व्यक्तिश: सहयोग देंगी यहतय हुआ और वैसेही हुआ।
१९४८-महात्माजी के वध के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, हिंदुमहासभा पर पाबंदी लगायी गयी। लेकिन चार छहघंयों में छोड दिया गया। संघ पर लगाया गया प्रतिबंध उठाया जाय इसके लिये सभी ओर प्रयास चल रहे थे। यश प्राप्त न हो सका। अत: सत्याग्रह का मार्ग स्वीकारना पडा। समिती कई सेविकाओंने सत्याग्रह में सहभाग लिया। मुंबर्स में तथा नागपुर में विराट मोर्चे निकाले गये और मुख्यमंत्री जी को निवेदन दिया गया। मुंबई के सभी महिला मंडलो को एकत्रित कर एक कार्यक्रम हुआ। अध्यथ थे मुख्यमंत्री मोरारजी भाई देसाई । कार्यक्रम समाप्त होने के बाद जब वे बाहर निकले तब समिती सेविकाओंने उनके हाथ प्रतिबंध हटाया जाय* ऐसे पत्रक दिये। सभी को पकडा गया। अलग अलग पुलिस थानों में रखा गया।चार घंटोंके बाद छोड दिया गया। ऐसे कार्यक्रम कई जगह हुएँ।
१९५६ से १९६१ -गोवा मुक्ति आंदोलन-गोवा विमोचन समिती द्वारा होनेवाले सत्याग्रहों में सेविकाओं का सहभाग था। विविध स्थानों से पुणे में एकत्रित होनेवाले सत्याग्रही गुटों की भोजन की व्यवस्था वं ताई आपटे जी के नियोजन से होती रही। गोलीबारी में मृत लोगों के शव आते थे। दुर्गंध आती थी। फिर भी उनकी व्यवस्था में सेविकाओंने सहयोग दिया।
१९६२ -चीन आक्रमण-प्रथमोपचार में सहयोग -निशानेबाजी केंद्र तथा मंदिरों में  प्रार्थनाकेंद्र चलायें। मा. qसधुताई फाटक ने केन्द्रीय सुरक्षामंत्री श्री यशवंतराव चव्हाण की भेट लेकर नागरी सुरक्षा व्यवस्था के लिये १०० सेविकाएँ किसी भी समय आपकों मिलेंगी, यह आश्वासन दिया था। आक्रमण संबंधी जानकारी दी गयी तथा सामान्य लोग कैसे मदद कर सकते है यह प्रबोधन भी किया गया।
१९६५ -पाकिस्तान का आक्रमण हुआ। जवानों का मनोधैर्य बढाने राखियाँ भेजी गयी। उनको आवश्यक चीजे देना, स्टेशनपर भोजन पहुंचाना आदि कार्य किये। मा.qसधुताई जीने जैसलमेर, जयपुर,बारमोर आदि बेस कँपों को भेट दी। एक स् िप्रत्यक्ष युद्ध केंद्र पर अनेक बाधाओं को पार कर पहुंचती है और जवानों को धीरज बंधाती है।  यह दृश्य ही प्रेरक था। युद्धसमाप्ति के बाद जब प्रधानमंत्री शास्त्रीजी ताश्कंद जानेवाले थे तब मा. qसधुताई और दिल्ली की सेविकाएँ उनसे मिली और *युद्ध की जाँच जिनको सहनी पडी है ऐसी स्त्रियों को न्याय मिले, उनका सम्मान रहे ऐसी ही वार्ता हो। यह निवेदन २५,००० हस्ताक्षर संग्रहित कर उनको दिया गया। जवाहरलाल को भेज दिया।
१९७१ कें युद्धकाल में भी सहायता की। वं. मौसीजी ने पंतप्रधान इंदिराजी को पत्र भेजकर उनके धैर्यपूर्ण निर्णय के लिये अभिनंदन किया था।
१९७५ -आपात्काल । समन्वय समिति के द्वारा किये गये सत्याग्रह में सेंकडो सेविकाओंका सहयोग था। सत्याग्रहियोंकी आरती उतारना,(पकडे जाने का भय होते हुए भी) मिसबंदियों के परिवारों को मिलना, आवश्यक मदद करना। पत्रक बाँटनां संदेश पहुंचाना। भुमिगतों को घर में आश्रय देना, आदि काम सेविकाओं ने किये।
१९७६ की विजयादशमी को संपूर्ण देश में सायं ६ बजे सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके, शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणी नमोऽस्तुते। यह श्लोक बोला गया। कई जगह आपत्ति निवारणार्थश्री सूक्त पारायण भी  किये गये। सामूहिक प्रार्थना से शक्ति उत्पन्न होती है। यह अपना विश्वास है।
१९९९- कारगिल युद्ध -जवानों को ऊ नी वस्त्र भेजे गये। पुणे की qकग्ज मेरी इन्स्ट््िट्यूट में दाखिल विकलांग जवानों को कुछ दवाइयां और जांच हेतु आवश्यक मशीन दिये गये। उनको हर साल दीपावली में मिठाई और संक्रमण के समय तिलगुड भेजा जाता है। मनोरंजन के लिये कुछ कार्यक्रम भी होते है। जगह जगह के शहीद जवानों घर जाकर सांत्वना देने का कार्य पूरे भारत वर्ष में समिति सेविका ओं ने किया। पूर्व सैनिक परिषद जम्मू रा.स्व. संघ और राष्ट्र सेविका समिति ने दिल्ली,जम्मू आदि स्थानों पर कार्यक्रम लेकर सांत्वना के साथ कुछ आवश्यक वस्तुएं भी दी। केंद्रीय कार्यकारिणी की दो सदस्या उसके लिये जम्मू गयी थी।
गोवधबंदी आंदोलन १९५२-५३ लक्षावधी सेविकाओं तथा भारत के नागरिकों की स्वाक्षरी ले कर पत्र पंडीत जवाहरलाल जी को भेजा गया।
जम्मू काश्मीर बचाओ अभियान १९९० -राष्ट्र सेविका समिति की ओर से लिया गया। उसी की एक कडी के रूप में समिति ने वहाँ के राज्यपाल श्री. जगमोहनजी को नागपुर में आमंत्रित किया था। स्वागत में शिकार के आकार का पुष्पगुच्छ और संत्रे तथा सेव से बनी माला भेट की गयी। इस अभियान के अंतर्गत स्थान स्थान पर  मोर्चे निकाले गये। लोगों को जम्मू काश्मीर और उसकी समस्याओं के बारे ंमें जानकारी दी गयी।
स्वदेशी आंदोलन १९९५ – स्वदेशी यह विषय लेकर वं. उषाताई जी का आंध्र और असम में प्रवास हुआ।
१- १५ हिसेंबर देशभर स्वदेशी पखवाडा मानाया गया। कर्नाटक में ५,००० घरों से संपर्क हुआ। भाग्यनगर, आंध्र में मा. सीतालक्ष्मी जी का यहीं विषय लेकर प्रवास हुआ। नांदेड, यवतमाळ, नागपुर(महाराष्ट्र) में स्वदेशी भोजन के संबंध में कार्यक्रम हुए। भारतीय वस्त्र, स्वदेशी खेल के कार्यक्रम दिखाये गये। उत्तर प्रदेश में ८९००० घों से संपर्क हुआ। असम में ३०,००० घरों से संपर्क और ८२ मातृ संम्मेलन हुए।
शताब्दियां
रानी लक्ष्मीबाई
१९२८ जून- रानी लक्ष्मीबाई के बलिदान की शत संवत्सरी के उपलक्ष्य में नासिक में उनका स्मारक निर्माण किया गया। नागपुर और वर्धा में भी एक चौराहें में रानी का पुतला स्थापित हुआ। आज तक पद्धति रही है कि रानी के स्मरण दिन पर सेविकाओं के साथ नगरपालिका की ओर से भी वहां माला चढायी जाती है।
१९८३ रानी लक्ष्मीबाई के १२५ वे पुण्यतिथी के उपलक्ष्य में संपूर्ण भारत में कार्यक्रम हुए। उनकी कर्मभुमि झांसी में उनकी प्रतिमा की भव्य ाोभायात्रा निकली। उनकी जीवन का चित्रदर्शन,संगीतिका तथा कवयित्री संमेलन और परिसंवाद का आयोजन किया गया था।
स्वामी विवेकानंद
१९६३ -जन्मशताब्दी मनायी गयी।
१९९२ में उनकी १२५ वी जयंती थी। यह वर्ष युवती स्वयंप्रेरणा वर्ष के रूप में मनाया गया। विविध सामाजिक कार्यो में युवतियों का सहभाग रहा। गनिनी निवेदिता ने स्वदेशी का समर्थन, प्रचार किया था। अत: सभी जगह निवेदिता के कार्य का कथन, स्वदेशी वस्तुओं का प्रदर्शन, स्वदेशी खेलों की प्रतियोगिताएँ, स्वदेशी संगीत, स्वदेशी खाद्यपदार्थ सिलिगुडी मालदा यहां भी बडा कार्यक्रम हुआ। वहां की निवेदिता जी की समाधि की दुरूस्ती हो जायें और एक रास्ते को उसका नाम दिया जाय ऐसा निवेदन पश्चिम बंगाल के जिल्हाधिकारी को दिया गया। उस वर्षकासेविका वार्षिकांक भी निवेदिता विशेषांक था।
जिजामाता
१९७४ जिजामाता की ३०० वी पुण्यतिथि उनका जन्मस्थान qसदखेडराजा तथा समाधिस्थान पाचाड में विशेष रूप से मनायी गयी। के कार्यक्रम के समय रेल्वे का हडताल था। फिर भी ४०० सेविकाएँ उपस्थिती थी। मुंबई शाखा ने स्वर जिजाई इस संगितीका के ५० कार्यक्रम किये। नागपुर में *स्वप्न हे साकारले* यह भव्य गीत, निवेदन और दृश्य प्रसंगो का कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया। सालभर देशभर मेंं अन्य संस्था ओं को संमिलित कर विविध कार्यक्रम हुए।
१९९९ -गुजरात में कर्णावती शहर में एक मार्ग औैर एक चौराहे को जिजामाता नाम दिया गया।
२००१. जिजामाताकी ४०१ वा जन्मदिन। विशेष डाकतिकट जारी किया गया और उस लोकार्पण कार्यक्रम तत्कालीनप्रधानमंत्री में एक दिन का कार्यक्रम हुआ। उनके समाधिस्थान के बाजू में फलक लगाया गया। विशेष घोषरचना के वादन से मानवंदना दी गयी। शोभायात्रा निकाली गयी। पापडोस के गांवों से सार्वजनिक कार्यक्रम के लिये महिला-पुरूष आयेथे। मुंबई शाखा ने मुंबर्स-ठाणे रायगड के ४०० गावों में जाकर जिजामाता का कार्य बताया। समापन समारोह रायगड में हुआ। ४०० सेविकाएँ उपस्थित थी।
प. पू. डॉ. हेडगेवार
१९८८ जन्मशताब्दी -समिति की ओर से भी मनायी गयी। १९३८ के समिति शिक्षा वर्ग में दिया गया डॉक्टरजी का बौद्धिक छपवाकर देशभर वितरित किया।
देवी अहल्याबाई होलकर
१९९४-२५ डिसेंबर को देवी अहल्याबाई द्विशताब्दी महोत्सव उनके जन्स्थान चौडी में मनाया गया।छोटासा गाव होने के कारण बहुतसी व्यवस्थाये बाहर से करनी पडी। एक दिन कार्यक्रम का समापन वं उषाताईजी ने किया। पडोस गावों से ३०० लोग आये थे। इस वर्ष का समापन महोत्सव उनकी कर्मभूमि महेश्वर में हुआ। चौडी में उनके मायके के qशदे कुल तथा माहेश्वर में होलकर कुल के सदस्य शामील हुए थे।
सुभाषचंद्र बोस
१९९६ -जन्मशताब्दी वर्ष २३ जनवरी १९९६ को कोलकता के गोयाबागान मैदान से पथसंचलन निकला।
१९९९ – रानी चेन्नमा की १७५ वी पुण्यतिथि थी। उनका चरित्र कथन हुआ।
आचार्य शंकरदेव, असम-५५१ वी जयंती के उपलक्ष्य में सेविका प्रकाशन ने एक पुस्तिका प्रकाशित की।
खालसा पंथ त्रिशताब्दी -शाखाओं ने खालसा पंथ और दसों गुरूओंके देशप्रेम की कथांएँ बतायी गयी। सिक्ख लोगों के कार्यक्रमोंमें सहभाग लिया।
सोमनाथ पुनर्निर्माण
२००० -स्वर्णजयंती वर्ष सोमनाथ सहित सभी ज्योतिर्लिंग स्थानों पर अभिषेक और सार्वजनिक कार्यक्रम हुए। सोमनाथ का इतिहास अखिल भारतीय स्तर पर बताया गया। समाचार पत्रों में लेख छपवाये गये। विज्ञान और शिवqलग का साधम्र्य प्रकट किया गया।
समिति की रजतजयंती(१९६०), वं मौसीजी का षष्ट्पूर्ति वं मौसीजी का षष्ट्यब्दिपूर्ति समारोह (१९६५) वं.ताईजी का अमृतोत्सव (१९८५), वं. ताईजी का अमृतोत्सव (२००२), य कार्यक्रम भी समिति कार्य विस्तार के विविध कार्यक्रमोंसे संपन्न हुए। वं मौसी जी के षष्ट्यब्दिपूर्तिसमारोह से प्राप्त निधि  देवी अहल्या मंदिर के निर्माण के लिये तो वं. उषाताई जी के अमृतमहोत्सव में प्राप्त निधि बडा हाफलाँग,असम स्थित रानी माँ गाईदेन्ल्यू कन्या छात्रावास के लिये समर्पित हुआ।  वं. मौसी जी की जन्शताब्दी के निमित्त आयोजित वं. मौसीजी की स्मृति प्रदर्शनी परिक्रमामें ही मा. प्रमिलाताई जी का अमृतमहोत्सवी वर्ष ता। उसमें जगह जगह प्राप्त राशि अन्यान्य संस्थाओं को दी गयी।

विविध कार्यक्रम
१९७१ में बेलगांव में समिति और स्थानिक महिला मंडल के सहयोग से शारदोत्सव प्रारंभ हुआ। आज भी वह परंपरा कायम है। महाराष्ट्र में अन्य शहरों में भी अब इसकी प्रथा रूढ हो गयी।
दि. २३ फरवरी १९८५ को त्रचूर में केरल प्रांत संमेलन हुआ। १००० सेविकाएँ उपस्थित थी। पथसंचलन हुआ।
१९८८ अहमदनगर जिले का राहुरी ग्राम देवी तुळजाभवानी का मायका माना जाता है। वहां पाच घंटों का शिबिर हुआ। देवी की पालकी बनानेवालोंका सत्कार किया। इसी वर्ष ठाणें में अखिल भारतीय कीर्तन वर्ग संपन्न हुआ।
१९९२ हुबली के ईदगाह मैदान पर १५ अगस्त के दिन राष्ट्रध्वज फहराने को मुस्लिमोंका विरोध था।
उनके आतंक के कारण वह परंपरा खंडित हो रही थी। अत: युवक युवतियों ने स्वातंत्र्यदिन को वहां ध्वज फहराने का प्रण किया। इस उपक्रम में समिति सेविकाओं का भी सहभाग था। विरोध के लिये एकत्रित आये मुस्लिम, दंगा रोकने के लिये नियुक्त पुलिस व्यवस्था सभी को भेदकर सेविकाओं ने छाते में छिपाया हुआ ध्वज फहराया। पुलिस को भी दक्ष आज्ञा देकर राष्ट्रगीत गााया। उसके पश्चातहु पुलिस उन्हें पकड पायी। पुलिस थानें जाने पर वहां के ध्वजवंदन के कार्यक्रम के बाद भी संपूर्ण वन्दे मातरम् का गायन किया।
१९९४ से मुंबई से सायन हॉस्पिटल के सामनेवाले, आंबेडकर चौक तक जानेवाले रास्ते को वं लक्ष्मीबाई केळकर रास्ता नाम दिया गया।
१९९६ -बंगलोर में आयोजित सौंदर्यप्रतियोगिता  रोकने हेतु मा. शांताक्का की अध्यक्षता में समिति द्वारा प्रयत्न हुए। प्रदर्शनकारियों पर हुआ लाठी हल्ला सेविकाओं ने सह लिया। आखिर उनको स्थान बदलना पडा।लेकिन स्थान बदलकर प्रतियोगिता संपन्न हुई इसका दुख है।
१९९९ समिति की ओर से भगवद्गीता वर्ष मनाया गया। कर्मण्येवाधिकारस्त, यदिच्छसि तत्करू, हतो वा प्राप्यसि स्वर्ग जैसे विषयों पर विवेचन हुआ।
२००० नयी सहस्त्राब्दि के प्रारंभ में हिंदु नूतन वर्ष शुभेच्छा पत्रक पूर देश में वितरित किये गये। कई शहरों में चौराहें में खहे होकर आनेजानेवालों को मंगल तिलक लगाकर प्रसाद बाटा गया। आज भी यह कार्यक्रम अनेक नगरों में होता है।
मंगलोर में ४६,००० संख्या में मातृसंगम हुआ। समिति और चालीस महिला संगठनों ने संयुक्त आयोजन किया था। उसीके साथ ९०० सेवकाओं का अभ्यासवर्ग भी हुआ था। तमिलनाडू में अश्लील चित्रपट दिखानेवाले केबल ऑपरेटर के घर को घेराव किया गयो। इरोड कमें मंदिर के स्थान पर अन्य धर्मियों की गृहयोजनाबन रही थी। उसको विरोध कर समिति न वह आक्रमण रोका। आंर्ध में १०१ दीप जलाकर कारगिल विजय दिन मनाया गया।
जुनागड, गुजरात में श्रमदान से तालाब खोदा जा रहा था। उसमें समिति की ५०० सेविकाएं संमिलित हुई। लेह में ओयोजित qसधुदर्शन यात्रा में सभी सेविकाओं का सहभाग था। वाराणसी में लक्ष्मीबाई का जन्मस्थान साफसुथरा किया और वह वैसा ही रहें इसलिये शासकीय अधिकारियों को निवेदन किया। वाराणसी शाखा हरसाल भव्य कार्यक्रम का आयोजन करती है।
२००१ -भारत तिब्बत संघ की ओर से आयोजित शिबिर में समिति की सेविका डोलमा ने शिक्षिका के नाते सहयोग दिया। इसी वर्ष दलाई लामा के भारत आगमन को ४० वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रम में समिति का प्रतिनिधित्व मा. प्रमिलाताई मेढे ने किया था।
२००३ रक्तदान श्रेष्ठदान इस विषय पर नगर में प्रदर्शनी लगायी गयी। ठाणे, डोंबिवली,(मुंबई)में बाल सेविकाओं ने रेल्वे स्थानक पर खडे होकर भीड को अनुशासन देने का प्रयास किया। सभी को बायी ओर से चलो ऐसा आवाहन किया जाता था।
राष्ट्रपुरूष श्रीराम वं मौसी जी के आराध्य थे। अत: सन २००३ में रामक्षा कंठस्थ हो सस दृष्टि से पाठशालाओं मंडलों विविध संस्थाओं में जाकर सामूहिक रामरक्षा पठन किया गया। रामायण पर आधारित विविध कार्यक्रमों का आयोजन भी हुआ। नागपुर में श्रीरामचेतना जागरण सप्ताह के अंतर्गत ४० विद्यालय, अनेक महिला मंडल और विविध संस्थाओं से संपर्क किया।
सन २००५ यह वं. मौसीजी का जन्मशताब्दी वर्ष, उनकी जीवनी पर आधारित प्रदर्शनी के साथ मा. प्रमिलाताई जी का संपूर्ण भारत में २६६ दिनों में प्रवास हुआ। मूलत: १०० कार्यक्रमों की योजना थी। प्रत्यक्ष में १०७ स्थानपरकार्यक्रम हुएँ। इन सभी कार्यक्रमों का समापन नागपुर में दिनांक ६,७,८ नवंबर २००५ को आयोजित किया गया।
राष्ट्र सेविका समिति की द्वितिय प्रमुख संचालिका वं. ताई आपटेजी की जन्मशताब्दि वर्ष २००९-१० में मनाया गया। वं. ताईजी के अंजर्ले इस जन्मस्थानपर शताब्दिवर्ष का शुभारंभ हुआ। और ताईजी की कर्मभूमि पुणे में २४, २५, २६ दिसंबर २०१० क्षेत्र संमेलन में समापन समारंभ हुआ। महाराष्ट्र क्षेत्र द्वारा निरंतर सौ घंटोंका सूर्यनमस्कार अभियान संकल्पपूर्वक पूर्ण किया गया। अपने आप में अपूर्व ऐसे इस कार्यक्रम की विशेषता रही। लिम्का बुक में इस अभियान का रेकॉर्ड संमिलीत किया गया।
२००५ से २०१२ तक की कालावधी में अनेक सारे प्रांतों में प्रांत संमेलन हुए।
समितीद्वाारा भ. निवेदिता का स्मृती शताब्दीवर्ष २०१०-११ में संपूर्ण भारत वर्ष में मनाया गया।

तात्कालिक कार्य
इसमें समाविष्ट है कुछ प्रशिक्षण कार्यक्रम ।
पूर्वांचल में कार्यरत हमारी कार्यकर्ता बहने तथा अन्य स्वयंसेवी संस्थांओं के के काय्रकर्ताओं के ध्यान में आया है, कि छोटे छोटे गावों में प्राथमिक वैद्यकीय उपचार करनेवाले लोगों की आवश्यकता है। अपनी वत्सलता तथा मातृभाव के कारण सेवा और शुश्रूषा महिलाएंअच्छी तरह करती है यह सर्वकष अनुभव है। अत: सभी ने तय किया और अन्यान्य ग्रामों से २० बहनों को नागपुर में भेजा गया। विवेकानंद मेडिकल मिशन खापरी के सहयोग से उनको दाअी का प्रशिक्षण दिया गया। कालावधी था दो माह। उस शिक्षण के साथ सात्विक और पौष्टिक आहार बनाना, सर्वेक्षण करना, प्राप्त साधनोंसे उपचार करना यह भी सिखांयां गया। साथ ही साथ समाजसेवा भाव, समितिकार्य, सेवाभाव, कर्तव्य भाव जागरण भी हुआ। और यह सब नियोजन बद्धता से हुआ। परिणामत: सभी को अनुभव हुआ कि यह बहनें अपनें गांव की दीदी बन चुकी है। विशेषत: बाढ के समय उनकी मदद एकमेवाद्वितीय रही। स्थिती ऐसी है कि वहाँ प्राथमिक उपचार के लियेदवाइंयां भी उपलब्ध नही होती है। कर्स बार नागपुर से दवाइयां भी भेजी  जाती है। वैद्यकीय मदद के साथ इसका अप्रत्यक्ष लाभ है मतांतरण पर रोक। उनमें से २ बहनों का सिलाई काम तथा बुनकाम भी सिखाया गया। स्वाभिमान से वे सब अपनी जीविका प्राप्त कर रही है। स्त्रीजीवन विकास परिषद, ठाणे यहां भी वनवासी युवतियों को सिलाई, बुनाई, रसोईघर में कुछ चीजें बनाना, खास कर उनके स्थान पर मिलनेवाले पेड, पौधों का उपयोग कैसा हो सकता है यह सिखाया जाता है। बार बार ऐसी ६, ७ लडकियां आतीहै। उनको निवास और शिक्षा उपलब्ध करायी जाती है। उन्होंने तैयार की वस्तुओं की विक्री व्यवस्था होती है। कल्याण में एक माह के लिये किसी कोर्स के लिये आयी हुईवनवासी दो बहनों की निवास व्यवस्थ की जाती है। जळगांव में एक सेविका ने कहाँ, एक दो महिनों के कोर्स के लिये आयी हुईदो क्नयाओं को निवास व्यवस्था के साथ क्रोाावर्क भी सिखायां। अमरावती में एक सेविका ने मूकबधीर बच्चों को भाषा-उच्चारण सिखांया।  एक पुस्तिा भी पुणे की एक सेविका ने छपायी है। पुणें में एक अनपढ वसती के बच्चोंके लिये झुलाघर चलता है। मुलुंड का,क सेविका जरूरतमंद सेविकाओं को सिलाईकाम सिखाकर उन्हें स्वावलंबी बनाने का प्रयास करती है।
अन्य सहायता
युद्ध में विकलांग जवानों के लिये चलाये जानेवाले क्वीन मेरी इन्स्ट्ट्यिूट , पुणे यहां पुणे की सेविकाएँ मनोरंजक और संस्कारप्रद कार्यक्रम साल में दो बार प्रस्तुत करती है। द. कर्नाटक में सेवावस्ती में नेत्र चिकित्सा शिबिर लिया गया। ८० लोगों को ऐनक दिये गये। तथा ४लोगों को शस्त्रक्रिया े लिये आर्थिक सहायता की।
नागपुर में रूग्णोपयोगी साहित्य केंद्र में नाममात्र किरायें पर व्हील चेअर, वॉटर बेड,वॉकर आदि वस्तुएँ उपलब्ध करायी जाती है। उस उपक्रम सेप्राप्त राशि का व्यय भी रूग्णों के लिये ही होता है।
मध्यप्रदेश के सागर जिलें में पथारियां गांव में ठाकुर लोगों की रखेंलियां बहोत है। आयु के ४० साल के बाद वे निराधार बनती है। १९८७ में वहां संपर्क कर ऐसी निराधशर महिलाओं की पुनर्वसन और नयी बनानेवाली रखेंलियां पर रोक लगाने का प्रयास हुआ। बिलासपूर के पास होली के पूर्व १५ दिन स्त्रियोंका बाजार लगता है। उसका विरोेध कर संबंधित अधिकारियों से भेट लेकर बंद करने का प्रयास किया। लेकिन सभी का अनुभव है कि,ऐसे प्रयासों का फल तात्कालिक रहता है।
कर्नाटक में हिंदू विवाह वेदिका यह संसतश स्थापित कर विवाह संबंधी समस्याओं को सुलझाने के लिये मार्गदर्शन और सहायता दी जाती है। तामिळनाडू के सेलम में एक सिलाई शाखा चलायी जाती है। हिंदी भी पढाया जाता है।
हमारें सीमावर्ती कार्यक्षेत्रों में अपह्रत बालिकाओं की मुक्तता बलात धर्मांतरितों की वापसी और पुनर्वसन,आतंकवादी  हमलों के संबंध में सजगता और संबंधित लोगों को जानकारी देना ऐसे कार्य चलते रहते है। उस व्यक्ति की सुरक्षा की दृष्टी से वह प्रसिद्ध नही किया जाता है।
धार्मिक कार्यक्रम भी सेवाभावना से जोडे जा रहें है। एक सेविका का ६१ वे वर्षगाठ का कार्यक्रम था। उसने जांभवली गांव में जाकर ६१ कातकरी महिलाओं को टॉवेल /कपडा देकर नारियल से गोद भरी। १९७१ के बांगला युद्ध के बाद घायल जवान वानवडी ऑस्पिटल में थे। तब पुणे की सेविकाओं ने संक्रमणवायन उन जवानों की पतिनयों को दिये।
हमारे अष्टभुजा मंदिर जहाँ जहाँ है वहां एकत्रित धान्य, कपडे,हमेशा वनवासी पाडों पर, झुग्गी झोपहीयों में जाकर दिये जाते है। अकाल के समय पुणे के पास का राऊतवाडी गांव समिति ने गोद लिया था। आज भी वहां संपर्क  है। केवल अनाज धन ही नही शिक्षा संस्कारों का भी दान दिया गया।
नैसर्गिक तथा मानवनिर्मित आपदाओं में हर प्रकार की मदद यह तात्कालिक कार्य महत्वपूर्ण तथा उल्लेखनीय अंग है। और सस तात्कालिक कार्य के लिये एक स्थायी कोश रा. से समिति ने स्थापित किया है। आधारनिधी इस आकर्षक नाम से वह देवी अहल्याबाई स्मारक समिति, नागपुर का एक विभाग उस नाते कार्यरत है। चातुर्मास व्रत समाप्ती का दान हो किसी का कारण वयच बचा हुआ धन हो, किसी के स्मरणार्थ कुछ देना है। कुछ लोगों की वार्षिक दान की पद्धती के अनुरूप कुछ राशि, ऐसी छोटी बडीं राशियां इसमें सेविकाओंकी ओर से तथा कुछ सामान्य व्यक्तियों से सदैव एकत्रित होती रहती है। अपने धन का योग्य समय, योग्य जगह,योग्य ढंग स उपयोग होगा इस विश्वास से समाज के कई लोग नैसर्गिक आपदा के समय धन देते है। इस कारण आपदा के समय धन देते है। इस कारण आपदा आने के बाद उसमें तुरंत मदद दी जाती है। वह मदद भी आपदाग्रस्त लोगों की आवश्यकता जान कर दी जाती है। जैसे ही वातचक्र के कारण ओरिसा में मानवी जीवन उद्वस्त हो गया था। उस समयकपडों साथ तुरंत पोहा और गुड भेजा गया।जो हाथ पर लेकर भी खा सकते थे। ८-१० दिनों के बाद परिस्थिती जरासी सुधरी। पकाने के लिए कुछ साधन उपलब्ध हुए तब चावल भेजा गया। किलारी भुकंप के समय भी अत्यावश्यक चीजों का एक पॅकेट बनवाकर घर घर जाकर उन लोगों का सांत्वना दे कर वितरित कर दिए। हमारे पास यह है वही हम देंगे। चाहें तो लो यहीं भाव नही है ना ट्रक खाली करवाकर वापस जाने की जल्दी है। देश के किसी भी भाग में नदीबाढ,  भूकंप, वातचक्र, बीमारी ऐसी आपदा में मदद पहुंचायी जाती है। अभी अभी गुजरात भूकंप से नष्ट हुए मयापूर ग्राम का पुननिर्माण समिति की ओर से हुआ है। त्सुनामी ग्रस्त धीवरों को मछली पकहने की जालियां दी गयी है। महाराष्ट्र में वर्षाग्रस्त लोगों को आवश्यक वस्तुएँ दी गई है।
कुछ आपदाएँ मानवनिर्मित भी होती है। ऐस समय भी समिति अपना कर्तव्य निभाती है। उदा- १९८५ में भोपाळ वायू दुर्घटना के समय खाद्य पाकिट वितरित हुए। ४ सिलाई केंद्र शुरू किये गये। कपडा भी दिया गया। गुजरात में आरक्षण समस्या गंभीर बनीऔर कई लोग बेघर हुए। उस समय साडियां और ब्लाउज पीस दिये गयें। १९९५ में डोढा,भद्रवाह किस्तवाड आदि भाग आतंकग्रस्त हो गये। उनको सलवार कमीज और शाले वितरित हुई। उसी वर्ष नागपूर में गोवारी हत्याकांड हुआ। ६८ महिलाएंसरकारी अस्पताल में थी उनको साडियोंके साथ दवाइयाँ भी दी गयी। १९९० में जम्मू में आधार केंद्र स्थापित कर १ लाख रू. की दवाईयाँ और ४०० साडियां ,सलवार सूट, चद्दरे दी गयी। नगरों में सिलाई केद्र स्थापित कर सिलाई मशीन दिये गयें। शिक्षा के लिये उपयुक्त साहित्य भी दिया गया। ऐसे कई प्रसंग है जहाँ मदद पहुंचायी गयी है।
नैसर्गिक हो या मानवनिर्मित हो कुछ भी आपदा आ गुजरी तो उस स्थान की सेविकाएं तुरंत मदद कार्य में जुट जाती है। चाहे रोटी बनानी है,घायल लोगों की शुश्रूषा करनी है, चाहे उनको सुरक्षित स्थान तक लाना है या तात्कालिक निवास प्रदान करना है। अभी अभी जलप्रकोप हुआ तब महाराष्ट्र की एक सेविका के घर ७५ लोग ८ दिन रहें थे। स्वयं की qचता न करते हुए दिनरात सेविकाएं इस कार्य में जुट जाती है। अर्थात स्वयंप्रेरणा से। क्योंकी संस्कार ही है-समाज मेरा है और मै समाज की हूँ। अधिकारी से आदेश या आज्ञा आने तक रूकना यह भाव नही रहता है।
ऐसे समय और एक मदद अवश्यभावी हो जाती है-आपदग्रस्तों को सांत्वना देना, उनके मन में संकट के उपर उठनें की हिंमत निर्माण करना।, उनके दु:खमय जीवन में कुछ आनंद के क्षण निर्माण करना, उनके मन का निराधार भाव नष्ट करना। समिति की स्थानीय अधिकारी और सेविका कितनी भी कठिन स्थिती हो वहाँ पहुंच जाती है। लोगों के घर तथा अस्पताल जाकर लोगों की पुछताछ करती है। प्रसिद्धी विन्मुखता के कारण ना यह समाचार पत्रों आता है ना फोटो खींचे जाते है। लेकिन आपदग्रस्तों के मन में उनककी ममता एक विश्वास जरूर निर्माण करती है। आवश्यकतावश पथक भी भेजे जाते है। ये सविकाए उनकी मदद भी करती है। साथ साथ कहानियां, गीत, खेल, भजन के माध्यम से उनको उत्साह उमंग देती है। जब एक गृहिणी ऐसे मदद कार्य में सम्मिलित होती है तब स्वाभाविक ही वह अमिट संस्कार परिवार में भी निर्माण हो जाता है।
कर्तव्यपूर्ती के आनंद यह मूल्यवान धन है। पीठ पर फरा गया हाथ यह अनोखा प्रशस्तिपत्र है।

About Moushiji:

Rashtra Sevika Samiti observes Moushiji’s birthday as ‘Sankalp Diwas’ on Ashadha Shukla Dashami and this year it was on July 14, 2016 

On July 14, 2016 Nation remembered Laxmibai Kelkar, popularly known as ‘Moushiji’ on her 111th Birth anniversary today on Ashadha Shuddh Dashami. Moushiji was the founder Pramukh Sanchalika of Rashtra Sevika Samiti, World’s largest women’s organisation founded in 1936 under the inspiration of Rashtriya Swayamsevak Sangh.

Lakshmi Bai Kelkar ( July 5,1905 to November 27, 1978)

Vidarbha is a very fertile land producing enriching crops. Not only that but it has produced outstanding personalities who have preciously given a new dimension to the history  this land. Realisation of the mantra is the prestigious honour of this small region. Sangh and Samiti, the two major Hindu organisations of Akhil Bharateeya status, have their origin in this region.

As the daughter of Shri Bhaskarrao Datey and Yashodabai  of Nagpur, Kamal was born on Ashadha Shukla Dashami in Shake 1827 i.e. 5th July 1905. Kamal was re-named as Laxmi during her marriage.

Kamal was very sensitive, having keen observation power she assimilated the sense of Service from her elder aunt. Deep devotion towards motherland, dauntless spirit, resoluteness, organising capacity and many such qualities were transfused in her from her parents. Shri Bhaskarrao Datey, V. Mausiji’s father, was working in A-G’s office at Nagpur. In those days of foreign rule, purchasing and reading newspapers like Kesari edited by Shri. Lokmanya Tilakji, was looked upon as an act of treason by the foreign rulers. Kamal’s mother Smt. Yashodabai, used to purchase that paper and have a combined reading, calling all the ladies nearby to hear. She professed that she was not a Govt. employee as such, not liable to be governed by the rules applicable to them and was therefore, free to do anything in her personal capacity.

After some hot discussion with the nun teacher of the mission school regarding school prayer, Kamal discontinued going to the missionary school. After the establishment of Hindu Girls School, Kamal was admitted there but could not continue her studies due to some inevitable circumstances. Her academic career came to an end. But by her vast general reading she got well acquainted with the history and culture of this land as well as the state of affairs prevailing in those days.

Kamal was determined not to marry a man demanding dowry. Fortunately she was successful and was married to Shri Purusottamrao Kelkar, a well known advocate of Wardha. She was re-named as Laxmi according to the custom prevailing in Maharashtrian families Shri Kelkar had two small daughters from his first marriage. Young Laxmi had to undertake primarily the role of being their mother more than being a wife of a husband. Destiny wanted to test her qualities of motherhood as she had to be the mother of a number of girls throughout the country and gain the capacity to bestow motherly affection on them.

Young Laxmi, gifted with the spirit of patriotism, sacrifice, social consciousness and service could not remain idle or be satisfied in doing household work only. She was just looking for a chance to be able to participate again in freedom activities, of which the centre was Sevagram near Wardha. It was difficult for the dignified family of Kelkar to digest this idea as a matter of natural course. Managing efficiently the home front, she won over the good will and co operation of her sisters in law and gradually started to attend the meetings, prabhat pheries and such other programmes. She also took the opportunity of hearing the top most leaders of freedom movement. Law defiance movement was at its top. Laxmi was taking note of the gradual change in the social psyche. It came to her mind that the defiance of law which was used as a means to harass the foreign power, may take an unwanted turn to lawlessness in free Bharat and may lead to a chaos, if not controlled sternly. Obtaining political freedom was a must, but a proper channel inspiring the people to devote themselves to social and national duties and to abide by the laws and rules of a free country was also utterly essential. Then only the long cherished ideal of Ramraj could be a reality. She thought that every citizen of free Bharat must come forward readily with the firm common will and a total identification with the national interests, ancient glories,culture and traditions of Bharat. The sense of self respect and service to motherland before self was to be encouraged. How to put it into practice was a problem.

During this period some eminent personalities were putting efforts for women’s education and their allround progress. Due to western impact women were struggling for equal rights and economical freedom. That was leading to individual progress only, inviting self-centred-ness. There was every risk of women being non committed to love, sacrifice, service and other inborn qualities glorifying Hindu women. Of course, it was quite necessary to attain the prestigious position, in family and society, which was denied to her due to wrong ideas. Some periodicals published very cheap and vulgar pictures of women on the cover page. There was an outpour of news of sedition of women. Many women were attracted to the new easy going and showy way of western life. Forgetting their own self they were fascinated by the idea of equal rights and economic freedom. This unnatural change in the attitude of women might have led to disintegration of family, the primary and most important unit of imparting good Sanskaras. This was worrying Laxmibai. She heard Gandhiji advising the ladies to follow the life of Sita and Savitri. So she studied Ramayana as well as Mahabharat. She was also attracted towards the literature of Swami Vivekananda who professed that man and woman are equally important constituents of the nation, just like the two wings of a bird and both be equally trained for the national consciousness. Mausiji passed a restless time before coming to the conclusion that women should boldly come forward and bear the responsibility to solve the precarious problems.

In the meantime Vandaneeya Mausiji lost her husband in 1932 and was required to look after her eight children and a vast property. She gathered courage and faced the situation without surrendering her self respect. She was introduced to R. S. S. work through her sons. She was keenly observing the way of working based on individual contact, mutual love and voluntary discipline. It flashed to her that such organisational type of work amongst women, can meet the challenge of the time. Building up character, creating sense of patriotism and disciplined organisation was utmost necessary. Fortunately P. P. Dr. Hedgewar was to visit Wardha Shakha of R. S. S. With the help of local workers including Shri Appaji Joshi, she got an opportunity to see him. In their meeting Vandaneeya Mausiji expressed the urgency of organising the Hindu women on cultural and national basis. P. P. Doctorji, gifted with divine vision, was convinced and he conceded to the proposal provided V. Mausiji accepted all the responsibility in this respect. After having a number of rounds of free and friendly discussions, Rashtra Sevika Samiti came into existence in 1936 at Wardha on the auspicious day of Vijaya Dashami.

Pujaneeya Doctorji reiterated that in the interest of both the organisations, Sangh and Samiti should function independently but with mutual co operation, just like the parallel lines which go in the same direction, but never meet maintaining a specified distance between them. He promised all help and guidance in the beginning and abided by it. Still he stressed that Samiti should function independently.

P. P. Doctorji was the originator of the technique and mechanism of the science of orgnisation in modern era. Technique of any science is same for all creeds. Still the basic principles and philosophy of women’s life in Bharat is quite different from that of men. As such Vandaneeya Mausiji accepted the modus operandi of Sangh, but She herself sketched the working plan of Samiti’s work, and executed it to the minutest details very efficiently.

Vandaneeya Mausiji was good at nursing which is an important factor in curing any illness. It also proved very much beneficial in organisational work because she had to nurse a number of minds ailing from weaknesses of all kinds. It was really an ordeal in those days, for a young, socially and economically well placed widow to get engaged in such a type of work in which prestige, honour, publicity were far away nay they were never to be aspired for. Vandaneeya Mausiji had to face a lot of comments from her own people also. She faced them calmly but firmly. though many tried to exploit the situation. Vandaneeya Mausiji got herself trained in all the physical exercises, cycling, swimming etc. In the beginning She was too shy in delivering speeches. Smt. Venutai Kalamkar used to do it on her behalf; but gradually through her perseverance and firm will, She acquired most of the qualities demanded to lead the organisation.

The physical training syllabus of Samiti was finalised by Vandaneeya Mausiji in consultation with her co workers as well as some well known physicians and Yogavidnyana experts. She professed Hindutwa, the basic principle of Samiti with new relevance. She convinced many women to promote and protect it, through natural process of Sanskaras imparted in homes. The concept of Hindu women’s life was quite clear to her and she introduced the worship of Devi Ashtabhuja a symbol of realisation of Hindu women’s image. it is a symbol of integrated society, women’s chastity, purity, boldness, affection, alertness etc. It is the divine mother power that can build up a character based society.

Vandaneeya Mausiji toured with her small son to spread the network of Samiti Shakhas. In those days there were no facilities of berth or seat reservations. There was no schedule for buses also as most services were run by private parties. It was quite strenuous and risky to travel alone but having immense faith in God, Mausiji travelled with dedicated motive. She had to balance between her duties towards family and nation.

Through her planned exertion Samiti gradually attained Akhil Bharateeya status. But it was essential that all sevikas should also experience it. It was not sufficient only to arrange meetings, so Sammelan of Akhil Bharateeya nature was desirable and that was arranged first in 1945 at Bombay. Since then such Sammelans are being regularly arranged at every three years. V. Maushiji attended last the Bhagyanagar Sammelan in 1978, when she appealed all the sevikas to develop the seven inborn qualities of women, described in Geeta.

Vandaneeya Maushiji had felt the necessity of entering into the educational field long back in 1945. Some Shishu Mandirs were opened but in 1953 Gruhini Vidyalaya was opened in Bombay later on, to give it an Akhil Bharateeya Status, a new trust Bharateeya Shree Vidya Niketan was registered in 1983. The object was to reorganise the system of girls’ education, befitting to the traditions of this land.

V. Mausiji regarded Shri Ramayan, Mahabharata and Bhagawat as the vital source of energy. She studied these scriptures and epics very deeply in her young age and started delivering discourses on them, convincing the younger generation, that Shri Ram and Shri Krishna should be looked upon as national heroes. She felt that every woman must possess firm will, sanctity of thoughts and deeds, self-protecting spiritual power like Sita and Draupadi. A number of people thronged to hear her sweet, ringing voice and logical interpretation. She could obtain many ardent workers for Samiti through these means.

Vandaneeya Mausiji was very punctual, particularly neat and clean. She had a high sense of appreciation for qualities and art noticed in others. Many picture exhibitions were effectively arranged because of her encouragement only. She was equally good at cooking. She had a high asthetic sense. Being self-reliant she took many decisions, which proved beneficial in the long term, though they were heavily commented upon in the beginning. She knew by heart most of the Samiti songs and it was her practice to sing the songs by rotation at the time of her daily evening prayer. The idea of leadership was quite clear in her mind. She used to say that the leader should be only two steps ahead, so that in the absence of the leader, the followers would be easily able to fill up the gap, not allowing any void. She never liked to centralize all attention toward her only. In her last illness she was very much displeased when the state meeting of one state was postponed because of her illness. Such an impersonal attitude is very rarely found in the present time. She had many future plans for the work but unfortunately could not put them into practice. She was very much affectionate and loving like a mother but was equally strict as a general in organizational work.

Death does not discriminate anybody and we are taught that whoever is born has to leave this world one day; but to leave it with powerful and deep imprints is something rare. Every Sevika thought that Mausiji loved her more and was overwhelmed with sorrow at her departure on 27th November 1978 i. e. Kartika Krishna 12, the day on which Sant Shri Dnyaneshwar attained Samadhi. The news of her sad demise was broadcast on the Akashvani. Individual intimation also passed on from person to person. Innumerable men and women rushed to pay their last homage. Even the doctors treating her in the Medical College Hospital had developed homely intimacy with her. They as well as the staff there were overwhelmed with grief. She had become a source of affection there and reverence also. Most of the staff started working only after wishing her well.

It was a unique experience and sight hundreds of women joining the funeral of any woman, in a disciplined way. On the way to Ambazari Ghat her body rested in Shree Shakti Peeth, which was her creation but unfortunately was turned into her memorial. Samiti Prayer and last Pranam was offered. On 28th evening her journey to eternity started, leaving behind ever inspiring memories. Next day on 29th, Rani Laxmibai’s birth, anniversary was celebrated as per her last desire, by giving a guard of honor by the Ghosh gana ( Band Squad ) of Samiti.

Maushiji is not physically present now, her life will be a constant source of inspiration to thousands of Sevikas and also to many otther woman social activists.

ರಾಷ್ಟ್ರ ಸೇವಿಕಾ ಸಮಿತಿ

ಹಿಂದೂ ರಾಷ್ಟ್ರದ ಪುನರ್ನಿರ್ಮಾಣದ ಉದ್ದೇಶವನ್ನಿಟ್ಟುಕೊಂಡು ಕೆಲಸ ಮಾಡುತ್ತಿರುವ ಅಖಿಲ ಭಾರತ ಮಟ್ಟದ ಮಹಿಳಾ ಸಂಘಟನೆ ’ರಾಷ್ಟ್ರ ಸೇವಿಕಾ ಸಮಿತಿ’. ಇದನ್ನು ಸ್ಥಾಪಿಸಿದವರು ವಂದನೀಯ ಲಕ್ಷ್ಮೀಬಾಯಿ ಕೇಳ್ಕರ್ (ಪ್ರೀತಿಯಿಂದ ಮೌಶೀಜೀ ಎಂದೇ ಕರೆಯಲ್ಪಡುತ್ತಾರೆ). ಪ್ರಖರವಾದ ದೇಶಭಕ್ತಿ ಇವರಿಗೆ ತಾಯಿಯಿಂದಲೇ ಬಂದ ಬಳುವಳಿ. ಜನಿಸಿದ್ದು ಸಾಮಾನ್ಯ ಕುಟುಂಬದಲ್ಲಾದರೂ ಚಿಂತನೆ ಮಾತ್ರ ಉನ್ನತ ಮಟ್ಟದ್ದು.

ಸ್ತ್ರೀ ಮತ್ತು ಪುರುಷರು ರಥದ ಎರಡು ಗಾಲಿಗಳು ಎಂದು ಎಂದು ಸಾಮಾನ್ಯರೆಲ್ಲಾ ಭಾವಿಸುತ್ತಿದ್ದಾಗ, ಸ್ತ್ರೀ ರಾಷ್ಟ್ರದ ಸಾರಥಿ, ಆಕೆ ರಾಷ್ಟ್ರದ ಆಧಾರಶಕ್ತಿ ಎಂಬ ಪೂರ್ಣ ವಿಶ್ವಾಸ ಅವರದ್ದಾಗಿತ್ತು. ವೈವಾಹಿಕ ಜೀವನದ ತಾರುಣ್ಯದಲ್ಲೇ ವೈಧವ್ಯವೂ ಪ್ರಾಪ್ತಿಯಾಯಿತು. ಮನೆಯಲ್ಲಿ ೭ ಮಕ್ಕಳ ಜವಾಬ್ದಾರಿ ಹಾಗೂ ವೈಧವ್ಯ. ಈ ಪರಿಸ್ಥಿತಿಯಲ್ಲೂ ರಾಷ್ಟ್ರದ ಆಗಿನ ಪರಿಸ್ಥಿತಿ ಅವರ ಮನಸ್ಸನ್ನು ಗೊಂದಲಕ್ಕೀಡು ಮಾಡುತ್ತಿತ್ತು. ಭಾರತದ ಪ್ರಗತಿಗೆ ಹಿಂದೂ ಮಹಿಳೆಯರ ಹಿಂದೂ ಮಹಿಳೆಯರ ಸಂಘಟನೆಯೇ ಸೂಕ್ತವಾದ ಉತ್ತರ ಎಂಬುದನ್ನು ಮನಗಂಡು ಸಂಘಸ್ಥಾಪಕ ಪ. ಪೂ. ಡಾಕ್ಕರ್‌ಜೀಯವರ ಸಲಹೆ, ಮಾರ್ಗದರ್ಶನದ ಮೇರೆಗೆ ೧೯೩೬ರ ವಿಜಯದಶಮಿಯಂದು ನಾಗಪುರದ ವಾರ್ಧಾದಲ್ಲಿ ಸಮಿತಿಯನ್ನು ಪ್ರಾರಂಭಿಸಿದರು. ಸ್ತ್ರೀಯ ಜೀವನಕ್ಕೆ ಪ್ರೇರಣಾಸ್ರೋತವಾಗಬಲ್ಲ ದೇವಿ ಅಷ್ಟಭುಜೆ, ಕರ್ತೃತ್ವಕ್ಕೆ ದೇವಿ ಅಹಲ್ಯಾಬಾಯಿ ಹೋಳ್ಕರ್, ಮಾತೃತ್ವಕ್ಕೆ ಜೀಜಾಬಾಯಿ ಹಾಗೂ ನೇತೃತ್ವಕ್ಕೆ ಝಾನ್ಸಿರಾಣಿ ಲಕ್ಷ್ಮೀಬಾಯಿಯರನ್ನು ಸಮಿತಿಯ ಸೇವಿಕೆಯರೆದುರು ಆದರ್ಶವಾಗಿರಿಸಿದರು.
ಮೌಶೀಜೀ ಅಂದು ಇಟ್ಟ ಒಂದು ದಿಟ್ಟ ಹೆಜ್ಜೆ ಇಂದು ದೇಶದಲ್ಲಷ್ಟೇ ಅಲ್ಲ, ವಿದೇಶಗಳಲ್ಲೂ ಶಾಖೆಗಳನ್ನು ಹೊಂದಿದೆ. ಸಮಿತಿ ಈ ಮಟ್ಟಕ್ಕೆ ತಲುಪಲು ಕಾರಣವಾದ ಅಪೂರ್ವ ಸಾಧನವೇ ದೈನಂದಿನ ಅಥವಾ ಸಾಪ್ತಾಹಿಕ ಶಾಖೆ. ಒಂದು ಗಂಟೆಯ ಈ ಅವಧಿಯಲ್ಲಿ ದೇಶಭಕ್ತಿಗೀತೆ ಸುಭಾಷಿತ, ಕಥೆ, ಯೋಗಾಸನ ಮತ್ತು ಬುದ್ಧಿ ಶರೀರಕ್ಕೆ ಕಸರತ್ತು ನೀಡುವ ಆಟಗಳಿರುತ್ತವೆ. ಹೀಗೆ ನಮ್ಮ ಅರಿವಿಗೆ ಬರದೇ ಹೃದಯ ಹೃದಯಗಳನ್ನು ಜೋಡಿಸುವ ಕೆಲಸ ಶಾಖೆಯಲ್ಲಿ ನಡೆಯುತ್ತದೆ. ಇಲ್ಲಿ ತಯಾರಾದ ಸೇವಿಕೆಯರು ಸಮಾಜದ ಅನ್ಯಾನ್ಯ ಕಾರ್ಯಗಳಲ್ಲಿ ಜೋಡಿಸಿಕೊಳ್ಳುತ್ತಾರೆ. ಈಗ ದೇಶದಲ್ಲಿ ಸಮಿತಿಯ ಕಾರ್ಯಕ್ಕೆ ಜೀವನವನ್ನು ಮುಡಿಪಾಗಿಟ್ಟ ಸುಮಾರು ೫೦ ಪ್ರಚಾರಿಕೆಯರಿದ್ದಾರೆ.  ದೇಶಾದ್ಯಂತ ಸಾವಿರಾರು ಶಾಖೆಗಳಿವೆ. ಕೇವಲ ದಕ್ಷಿಣ ಕರ್ನಾಟಕ ಪ್ರಾಂತದಲ್ಲಿ ೨೧೦ ಶಾಖೆಗಳು ಹಾಗೂ ಸಂಸ್ಕಾರ ಕೇಂದ್ರಗಳಿವೆ. ಶಾಖೆಗಳನ್ನು ಮೂಲ ವಾಗಿಟ್ಟುಕೊಂಡು ಸಮಿತಿಯು ಹಲವಾರು ರಚನಾತ್ಮಕ ಕೆಲಸಗಳನ್ನು ನಡೆಸುತ್ತದೆ.
ಮುಂಬೈಯಲ್ಲಿ ಗೃಹಿಣೀ ವಿದ್ಯಾಲಯ : ಕಡಿಮೆ ವಿದ್ಯಾಭ್ಯಾಸ ಹೊಂದಿರುವ ಗೃಹಿಣಿಯರನ್ನು ಗಮನದಲ್ಲಿಟ್ಟು ಪಠ್ಯಕ್ರಮವನ್ನು ರಚಿಸಿ ಸ್ತ್ರೀಯರು ಉತ್ತಮ ಗೃಹಿಣಿಯರಾಗಲು ಬೇಕಾಗುವ ಶಿಕ್ಷಣ ನೀಡಲಾಗುತ್ತದೆ. ನಾಸಿಕದ ರಾಣಿ ಲಕ್ಷ್ಮೀಭವನದಲ್ಲಿ ಕೈಕೆಲಸದ ತರಗತಿಗಳು, ಉದ್ಯೋಗ ಮಂದಿರ, ಬಾಲಕ ಮಂದಿರ, ಸಾಂಸ್ಕೃತಿಕ ವರ್ಗಗಳನ್ನು ನಡೆಸಲಾಗುತ್ತದೆ.
ನಾಗಪುರದಲ್ಲಿ ದೇವಿ ಅಹಲ್ಯಾಮಂದಿರ :  ಇಲ್ಲಿ ಒಂದು ಶಿಶುವಿಹಾರ, ಹುಡುಗಿಯರ ವಸತಿಗೃಹ, ವಾಚನಾಲಯವಿದೆ. ಗುಜರಾತ್‌ನಲ್ಲಿ ಬಡವಿದ್ಯಾರ್ಥಿಗಳಿಗೆ ಉಚಿತ ಸಮವಸ್ತ್ರ, ಪುಸ್ತಕಗಳು ಹಾಗೂ ಶುಲ್ಕವನ್ನು ನೀಡಲಾಗುತ್ತಿದೆ. ನಾಗಪುರದಲ್ಲಿ ಶಕ್ತಿಪೀಠದಲ್ಲಿ ಉಚಿತ ಆರೋಗ್ಯ ಕೇಂದ್ರ ಮತ್ತು ಉದ್ಯೋಗಮಂದಿರಗಳಿವೆ. ದಿಲ್ಲಿಯ ಕೊಳಚೆ ಪ್ರದೇಶಗಳಲ್ಲಿ ಶಿಶುವಿಹಾರ ಗಳನ್ನು ನಡೆಸುತ್ತಿದ್ದಾರೆ. ಬೆಂಗಳೂರಿನಲ್ಲಿ ಹೊಲಿಗೆ ಹಾಗೂ ಕಂಪ್ಯೂಟರ್ ಶಿಕ್ಷಣವನ್ನು ಉಚಿತವಾಗಿ ನೀಡಿ ಅನಂತರ ಸ್ವ-ಉದ್ಯೋಗಕ್ಕೆ ಅವಶ್ಯಕವಿರುವ ಎಲ್ಲಾ ಸಹಕಾರ ನೀಡುತ್ತಿದೆ. ಆರ್ಥಿಕವಾಗಿ ಹಿಂದುಳಿದವರ ಶಸ್ತ್ರ ಚಿಕಿತ್ಸೆಗಳಿಗೂ ನೆರವು ನೀಡಲಾಗುತ್ತದೆ. ನೆರೆ, ಭೂಕಂಪ, ಬರಗಾಲ ಮುಂತಾದ ಪ್ರಾಕೃತಿಕ ವಿಕೋಪಗಳ ಸಂಧರ್ಭಗಳಲ್ಲಿ ಗ್ರಾಮಗಳನ್ನು ದತ್ತು ಪಡೆದು ಮಾದರಿ ಗ್ರಾಮಗಳ ನಿರ್ಮಾಣ ನಡೆಯುತ್ತದೆ. ಬೆಂಗಳೂರಿನ ಶಾಲಾ ಕಾಲೇಜುಗಳಲ್ಲಿ ಪ್ರಾಂಶುಪಾಲರ ಅನುಮತಿ ಪಡೆದು ವಾರದಲ್ಲಿ ಒಂದು ಗಂಟೆಯಷ್ಟು ಕಾಲ ಹೆಣ್ಣು ಮಕ್ಕಳಿಗೆ ಲವ್ ಜಿಹಾದ್‌ನಂತಹ ಸಾಂಸ್ಕೃತಿಕ ದಾಳಿಯ ಬಗ್ಗೆ ಜಾಗೃತಿ ಮೂಡಿಸಲಾಗುತ್ತಿದೆ.
ಸಮಿತಿಯಲ್ಲಿ ವರ್ಷಂಪ್ರತಿ ಗುರುಪೂಜೆ, ರಕ್ಷಾಬಂಧನ, ವಿಜಯದಶಮಿ, ಯುಗಾದಿ, ಸಂಕ್ರಾಂತಿ ಮುಂತಾದ ರಾಷ್ಟ್ರೀಯ ಉತ್ಸವಗಳನ್ನು ಆಚರಿಸಲಾಗುತ್ತದೆ. ಪ್ರತೀವರ್ಷ ದೇಶದ ಎಲ್ಲಾ ಪ್ರಾಂತಗಳಲ್ಲಿ ಏಪ್ರಿಲ್, ಮೇ ತಿಂಗಳಲ್ಲಿ ಪ್ರಥಮ ವರ್ಷ ಹಾಗೂ ದ್ವಿತೀಯ ವರ್ಷದ ಶಿಕ್ಷಾವರ್ಗಗಳು (೧೫ ದಿನ) ಹಾಗೂ ನಾಗಪುರದಲ್ಲಿ ತೃತೀಯ ವರ್ಷದ ಶಿಕ್ಷಾವರ್ಗವು ನಡೆಯುತ್ತದೆ. ಈ ಶಿಬಿರಗಳಲ್ಲಿ ೧೪ ವರ್ಷ ಮೇಲ್ಪಟ್ಟ ಹುಡುಗಿಯರು ಮಹಿಳೆಯರು ಭಾಗವಹಿಸಬಹುದು. ಇಲ್ಲಿ ರಾಷ್ಟ್ರ ಜಾಗೃತಿಗೆ ಪೂರಕವಾದ ಶಾರೀರಿಕ, ಬೌದ್ಧಿಕ ಶಿಕ್ಷಣ ನೀಡಲಾಗುತ್ತದೆ. ಹೀಗೆ ಸಮಿತಿಯ ಉತ್ಸವಗಳು, ಶಿಬಿರಗಳು ಹಾಗೂ ಇನ್ನಿತರ ಕಾರ್ಯಕ್ರಮ ಗಳಲ್ಲಿ ಭಾಗವಹಿಸುತ್ತಾ ಮಹಿಳೆಯರು ರಾಷ್ಟ್ರಕ್ಕೆ ತಾನೇನು ಕೊಡಬಲ್ಲೆ ಎಂಬುವುದರ ಬಗ್ಗೆ ಯೋಚಿಸಲಾರಂಭಿಸುತ್ತಾರೆ.
ವಿಳಾಸ : ರಾಷ್ಟ್ರಸೇವಿಕಾ ಸಮಿತಿ
’ಸುಕೃಪಾ’ # ೩೬೨೮, ೧೦ನೇ ಅಡ್ಡರಸ್ತೆ,
ಗಾಯತ್ರಿನಗರ, ಬೆಂಗಳೂರು – ೫೬೦ ೦೨೦
ದೂರವಾಣಿ : ೯೪೪೯೮ ೮೦೯೫೬