by MG Vaidya, RSS Ideologue December 11, 2012

खुदरा व्यापार में सीधे विदेशी निवेश (एफडीआय) को मान्यता देने के बारे में, संसद के दोनों सदनों में संयुक्त प्रगतिशील

मोर्चा (संप्रमो) का विजय हुआ, लेकिन साथ ही यह सरकार अल्पमत मे है, यह भी स्पष्ट हुआ है. सरकार का यह विजय तकनिकी (प्रावैधिक) है. सौदेबाजी से साध्य किया है.

MG Vaidya, RSS Ideologue

आँकड़ों का गणित
मतदान के आँकडे यही वास्तव स्पष्ट करते है. लोकसभा में, विदेशी निवेश को मान्यता देने की नीति अपनाने का प्रस्ताव वापस ले, ऐसा प्रस्ताव विपक्ष की ओर से रखा गया था, उसके पक्ष में २१५ मत पड़े. तो प्रस्ताव के विरोध में मतलब संप्रमो सरकार के पक्ष में २५३ मत पड़े. सरसरी तौर पर देखें तो सरकार के पक्ष में ३५ मत अधिक गिरे और सरकार का विजय हुआ, ऐसा दिखता है. लेकिन सरकार के विरोध में भूमिका लेकर और वह सभागृह में हुए भाषणों में स्पष्ट करने के बाद भी, समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के सदस्यों ने सरकार के विरोध में सभागृह से बहिर्गमन किया. इसका स्पष्ट अर्थ यह है कि, विपक्ष के २१५+४३ मतलब २५८ मत है. २५८ विरुद्ध २५३ ऐसा यह सही गणित है. इसका अर्थ यही है कि, प्रस्ताव के पक्ष में और सरकार के विरोध में जिन्होंने भाषण कर अपनी भूमिका स्पष्ट की, उन्होंने सरकार बचाने के लिए मतदान में भाग न लेकर, बर्हिगमन किया.
निर्लज्ज सौदेबाजी
सरकार के निर्णय के विरोध में रहते हुए भी, इन पार्टिंयों के सांसदों ने, सरकार को बचाने के लिए, इस प्रकार का दोमुँहा व्यवहार क्यों किया, यह समझना कठिन नहीं. ऊपर कहा ही है कि, इसमें सौदेबाजी हुई है. संपुआ को इसकी आदत है. अपनी सरकार बचाने के लिए किसी भी स्तर तक अध:पतित होने में उन्हें शर्म नहीं आती. वर्ष २००८ में, सांसदों को खरीदने के लिए नगद पैसों का उपयोग हुआ था. सरकार की ओर से घूस मिलते ही, कुछ सांसद बीमार पड़े, कुछ अनुपस्थित रहे तो अन्य कुछ ने सीधे-सीधे सरकार के पक्ष में मतदान किया. जो सरकार, मतलब सरकार चलाने वाले मोर्चे में की मुख पार्टी मतलब कॉंग्रेस पार्टी ही खुल्लम-खुल्ला भ्रष्टाचार करने में संकोच नहीं करती, वह विरोधी पार्टिंयों को अपने साथ जोड़ने के लिए सौदेबाजी करने में हिचकेगी, ऐसी अपेक्षा करना ही व्यर्थ है. जिन पार्टिंयों के साथ सरकार ने ऐसी सौदेबाजी की वे है (१) सपा (२) बसपा. सपा का उत्तर प्रदेश में शासन है. हमने यह बात निश्‍चित समझनी चाहिए कि, इस सरकार के कुछ लोकार्षक काम करने के लिए संप्रमो सरकार ने ठोस सहायता का आश्‍वासन दिया होगा. बसपा की सर्वेसर्वा मायावती, भ्रष्टाचार मतलबसंपत्ति के मामले में फँसी है. अपराध अन्वेशन विभाग (सीबीआय) उनकी संपत्ति की जॉंच कर रहा है. इस जॉंच से मुझे बचाओ, यह अपने समर्थन की किमत मायावती ने मॉंगी होगी, तो कोई आश्‍चर्य नहीं.‘सीबीआय’ने स्वयं का ‘क्रिमिनल ब्यूरो ऑफ इन्व्हेस्टिगेशन’ नाम सार्थ करने के बदले ‘कॉंग्रेस ब्यूरो ऑफ इन्व्हेस्टिगेशन’ ऐसा रूपांतरित किया है, ऐसी उसकी बार-बार जो आलोचना होती है, वह कोरी निराधार है, ऐसा दिखने लायक ‘सीबीआय’का वर्तन शुद्ध नहीं. लड़ाई में और प्रेम में सब कुछ माफ होता है, इस अर्थ की एक कहावत अंग्रेजी में है. लड़ाई का अर्थ प्रत्यक्ष शस्त्रयुद्ध न मानकर, राजनीतिक पार्टिंयों में का सत्ता संघर्ष ले, तो कॉंग्रेस को बहुत दोष नहीं दिया जा सकता. सही में दोषी सपा और बसपा ही है. इन्हें ‘राजनीतिक पार्टिंयॉं’ कहना उस संज्ञा का अपमान है. ये सत्ताकांक्षी टोलियॉं है; और हर टोली का जैसे एक सरदार होता है और उसके इशारे पर टोली के अन्य घटक वर्तन करते है, वैसा ही इन दो पार्टिंयों के बारे में हुआ है. इन लोगों को राजनीति के सिद्धांत, ध्येय, नीतियॉं और कार्यक्रम से कोई लेना-देना नहीं. टोली का स्वार्थ, वस्तुत: टोली के सरदार का स्वार्थ, यहीं उनकी तथाकथित राजनीति का प्रधान सूत्र है. लेकिन, कॉंग्रेस पार्टी, ऐसी टोलीनुमा पार्टिंयों की सहायता से विजय प्राप्त करने का आनंद मनाए, यह भारतीय राजनीति के भविष्य के दृष्टि से, अति सौम्य शब्दों में भी कहे, तो खेदजनक है.
मित्र पार्टिंयों की भूमिका
जिन्होंने बर्हिगमन नहीं किया, और जो संप्रमो की घटक है, उनमें से दो पार्टिंयों की नीतियों का भी विवेचन यहॉं प्रस्तुत है. उनमें से एक है राष्ट्रवादी कॉंग्रेस (राकॉं). संप्रमो में इस पार्टी के लोकसभा में के सांसदों की संख्या दो आँकड़ों की भी नहीं. लेकिन महाराष्ट्र में उनकी ताकत है; और उसी ताकत के बल पर महाराष्ट्र में कॉंग्रेस की सरकार टिकी है. कॉंग्रेस और राष्ट्रवादी कॉंग्रेस के विधायकों की संख्या करीब समान है. इस कारण राकॉं ने गठबंधन का धर्म पालन करते हुए संप्रमो सरकार के पक्ष में मतदान करना स्वाभाविक मानना चाहिए. लेकिन ऐसा दिखाई नहीं देता. ऐसा लगता है कि किसी अगतिकता के कारण राकॉं ने यह रास्ता अपनाया. लोकसभा में हुए मतदान के बाद और विदेशी पूँजी निवेश का रास्ता साफ होने के बाद, राकॉं के महाराष्ट्र के नेताओं के वक्तव्य देखे तो, यह स्पष्ट होगा कि, राकॉं को संप्रमो का निर्णय पूर्णत: मान्य नहीं. संप्रमो की सरकार के एक मंत्री, राकॉं के वरिष्ठ नेता और राकॉं के सर्वश्रेष्ठ नेता शरद पवार के अति निकट सहयोगी प्रफुल्ल पटेल का इस संदर्भ में का वक्तव्य विचार करने लायक है. ‘इंडियन एक्सप्रेस’ से बात करते समय पटेल ने कहा, ‘‘हमने मतलब राकॉं ने इस बारे में अंतिम निर्णय नहीं लिया है. हम पहले महाराष्ट्र की जनता के साथ बात करेगे और बाद में निर्णय लेंगे.’’लोकसभा में हुई चर्चा के समय, आक्रमक रूप से सरकार का पक्ष रखने वाले मंत्री कपिल सिब्बल ने अपने भाषण में कहा था कि, संप्रमो सरकार की इस नीति को महाराष्ट्र सरकार की अनुकूलता है. सिब्बल के इस वक्तव्य पर भी पटेल ने आक्षेप लिया और कहा कि, ‘‘महाराष्ट्र सरकार ने ऐसा कोई निर्णय नहीं लिया है. महाराष्ट्र में दोनों पार्टिंयों की एक समन्वय समिति है, वह इस पर चर्चा करेगी; इस नीति के परिणामों पर विचार करेगी और फिर तय करेगी कि, महाराष्ट्र में यह नीति लागू की जाय या नहीं.’’ प्रश्‍न यह है कि, फिर राकॉं ने विपक्ष के पक्ष में मतदान क्यों नहीं किया?
नए जनादेश की आवश्यकता
हाल ही में महाराष्ट्र के मंत्रिमंडल में फिर से आये भूतपूर्व उपमुख्यमंत्री अजित पवार ने मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण से मिलकर उन्हें बताया कि, हमें किसान, छोटे व्यापारी और खुदरा वस्तुओं के व्यापारियों के हितों का खयाल रखना होगा. इसके लिए पहले समन्वय समिति की बैठक बुलानी होगी. इस बारे में एक पत्र भी उन्होंने मुख्यमंत्री को दिया; उसमें स्पष्ट कहा है कि, इस बारे में कॉंग्रेस अकेले कोई भी निर्णय न ले. राकॉं के प्रवक्ता नबाब मलिक ने भी यही कहा है. ‘‘हम एफडीआय को समर्थन दे रहे है. लेकिन इसे लागू करने के पूर्व हमें कामगार, किसान, कृषि उत्पादन बाजार समितियों एवं सहकारी क्षेत्र के उद्योगों का भी विचार करना होगा.’’ राकॉं के प्रदेश अध्यक्ष पिचड ने भी ऐसा ही मत व्यक्त किया है. राकॉं अगर सीधे विदेशी पूँजी निवेश का मन से समर्थन करती होगी, तो ऐसे प्रश्‍न उपस्थित करने का क्या कारण? किस दबाव में राकॉं को संप्रमो की नीति को समर्थन देना पड़ा? और इतने विलंब से उसके मन में यह शंकाएँ क्यों निर्माण हुई? संसद का अधिवेशन आरंभ होते ही विपक्ष ने धारा १८४ के अंतर्गत, विदेशी पूँजी निवेश के इस मुद्दे पर चर्चा की मॉंग की थी. इस मांग का सरकार ने जोरदार विरोध किया. एक सप्ताह तक संसद का काम न चले ऐसी योजना की और जब सपा और बसपा को मनाने में सफलता मिली, तब सरकार धारा १८४ के अंतर्गत चर्चा कराने के लिए राजी हुई. इस दौरान राकॉं ने अपनी भूमिका निश्‍चित कर लेना सही होता. मतदान सरकार के पक्ष में करना और बाद में उसमें आक्षेप खोजना यह सियासी चाल हो सकती है, लेकिन यह चाल पार्टी नेतृत्व की ईमानदारी पर प्रश्‍नचिह्न निर्माण करती है. विरोधकों को मिलने वाले संभावित २५८ मतों में राकॉं के नौ मत मिलाए तो विदेशी पूँजी निवेश विरोधियों के मतों की संख्या २६७ होती है. द्रमुक की भी ऐसी ही स्थिति है. सीधे विदेशी पूँजी निवेश को उसका विरोध है. लेकिन गठबंधन के धर्म के अनुसार उन्होंने सरकार के पक्ष में मतदान किया. इस विवेचना का मथितार्थ यहीं है कि, लोकसभा में सरकार का बहुमत नहीं है. वह अल्पमत में आ गई है. उसने राज करने का नैतिक अधिकार खो दिया है. उसने नया जनादेश लेने की आवश्यकता है.
वैचारिक व्यभिचार
जो लोकसभा में हुआ वहीं राज्यसभा में भी हुआ. यदि राज्यसभा में विपक्ष ने प्रस्तुत किए प्रस्ताव के समर्थन में बहुमत प्रकट होता, तो भी सरकार पर हार का ठिकरा फोडकर कोई उसके त्यागपत्र की मांग नहीं करता. अब उसकी आवश्यकता भी नहीं रही है. सरकार के पक्ष में १२३ तो विपक्ष में १०९ मत पड़े. आश्‍चर्य यह कि जिस बसपा ने विरोध दर्शाते हुए लोकसभा से बहिर्गमन किया था, उसी ने राज्य सभा में खुले आम सरकार के पक्ष में मतदान किया. स्वाभाविक ही, इस सहयोग की पूरी किमत बसपा ने वसूली होगी ही. बसपा के राज्यसभा में १५ मत है. लोकसभा के समान ही राज्य सभा से भी उसके सांसदों ने बहिर्गमन किया होता तो सरकार के पक्ष में केवल १०८ मत गिरते और एक मत से ही सही विपक्ष को विजय मिलता. सरकार की ओर से नामनियुक्त सदस्यों की संख्या ९ है. उनका अंतर्भाव इस १२३ मत संख्या में है. सरकार की ओर से इन सांसदों पर जो उपकार किए गए है, उन उपकारों का उन्होंने ध्यान रखा, इतना ही कह सकेगे. वे, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष ही सही, जनता का प्रतिनिधित्व नहीं करते. लेकिन सपा और बसपा ने विचार एक और व्यवहार दूसरा ऐसा जो वैचारिक व्यभिचार लोकसभा में किया, वहीं राज्यसभा में भी किया. वहॉं भी उन्होंने अपनी विश्सनीयता की बलि देकर सरकार का समर्थन किया.
समन्वय और सहमति आवश्यक
लोकसभा और राज्यसभा के सदनों का मुद्दा विदेशों से संबंधित था. एक प्रकार से वह मुद्दा विदेश नीति से संबंधित था. जिन देशों में जनतंत्र प्रगल्भ है, वहॉं विदेश नीति और निर्णय सब की सहमति (कॉन्सेन्सस्) से लिए जाते है. लेकिन दुर्भाग्य से हमारे देश में ऐसा नहीं होता. सत्तारूढ संप्रमो ने, देश-हित का विचार कर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन तथा वाम मोर्चा और अन्य पार्टिंयों के रणनीतिकारों के साथ बैठकर, उनके साथ चर्चा कर सहमति बनाने का प्रयत्न करना चाहिए था. लेकिन संप्रमो ने ऐसा नहीं किया. उन्होंने यह रास्ता क्यों नहीं अपनाया, इसका उत्तर देना कठिन है. लेकिन संदेह की गुंजाईश है. वह संदेह यह कि, संप्रमो की सरकार अमेरिका और अन्य कुछ यूरोपीय देशों के दबाव में फँसी है. हम आशा करे कि, सरकार ने किसी के दबाव में न झुकते हुए अपनी सद्सद्विवेकबुद्धि से लिया है, यह सत्य होगा. भविष्य में, दुनिया में प्रत्यक्ष युद्धभूमि पर महायुद्धों की संभावना नहीं है. लेकिन आर्थिक एवं व्यापारिक आक्रमण की भरपूर संभावनाए है. हम विदेशी राष्ट्रों के योजनापूर्वक आक्रमण के शिकार न बने, ऐसी ही सब देशभक्त नागरिकों की इच्छा होगी. दुर्भाग्य से संप्रमो सरकार की ओर से वह पूरी नहीं होती, ऐसा दिखाई देता है. हम शांतचित्त से हमारे यहॉं स्थापन हुए अंग्रेजों के राज्य का इतिहास ध्यान में ले. व्यापार के लिए आई ईस्ट इंडिया कंपनी ने, हमारे देशी शासकों के बीच के समन्वय के अभाव और फूट का लाभ उठाकर, हमारे ही सैनिकों का उपयोग कर, हमें गुलाम बनाया था. १८ वी सदी में,उनकी चाल हमारे तत्कालीन शासकों के समझ में नहीं आई. क्या इक्कीसवी सदी में भी हम वैसा ही व्यवहार करेगे, यह प्रश्‍न हर किसी को चिंतित करेगा, इतना गंभीर है.
मा. गो. वैद्य