Article 370 धारा ३७० के सम्बन्ध में कुछ लक्षणीय हकीकती बिन्दू : By मा. गो. वैद्य

धारा ३७० के सम्बन्ध में कुछ लक्षणीय हकीकती बिन्दू

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१) धारा ३७० अपने भारत के संविधान का अंग है|

२) यह धारा संविधान के XXI वे भाग में समाविष्ट है| इस भाग का शीर्षक है- ‘अस्थायी, परिवर्तनीय और विशेष प्रावधान’ (Temporary, Transitional and Special Provisions).

३) धारा ३७० के शीर्षक के शब्द हैं – जम्मू-कश्मीर के सम्बन्ध में अस्थायी  प्रावधान’ (“Temporary provisions with respect to the State of Jammu and Kashmir”).

४) अपना संविधान २६ जनवरी १९५० से अमल में आया| धारा ३७० के तहत जो प्रावधान है उनमें समय समय पर परिवर्तन किया गया है| इस धारा का क्षरण १९५४ से प्रारम्भ हुआ| १९५४ का महत्त्व इस लिये है कि १९५३ में उस समय के कश्मीर के वजीर-ए-आजम शेख महम्मद अब्दुल्ला, जो कि अपने प्रथम प्रधानमन्त्री पं. जवाहरलाल नेहरू के अंतरंग मित्र थे, को गिरफ्तार कर बंदी बनाया था| ये सारे संशोधन जम्मू-कश्मीर के विधानसभा द्वारा पारित किये गये हैं|

५) संशोधित किये हुये प्रावधान इस प्रकार के हैं-

अ) १९५४ में चुंगी, केंद्रीय अबकारी, नागरी उड्डयन और डाकतार विभागों के कानून और नियम जम्मू-कश्मीर को लागू किये गये|

आ) १९५८ से केन्द्रीय सेवा के आयएएस तथा आयपीएस अधिकारियों की नियुक्तियॉं इस राज्य में होने लगी| इसी के साथ सीएजी (CAG) के अधिकार भी इस राज्य पर लागू हुये|

इ) १९५९ में भारतीय जनगणना का कानून जम्मू-कश्मीर पर लागू हुआ|

र्ई) १९६० में सर्वोच्च न्यायालय ने जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय के निर्णयों के विरुद्ध अपीलों को स्वीकार करना शुरू किया, उसे अधिकृत किया गया|

उ) १९६४ में संविधान के अनुच्छेद ३५६ तथा ३५७ इस राज्य पर लागू किये गये| इस अनुच्छेदों के अनुसार जम्मू-कश्मीर में संवैधानिक व्यवस्था के गडबडा जाने पर राष्ट्रपति का शासन लागू  करने के अधिकार प्राप्त हुए|

ऊ) १९६५ से श्रमिक कल्याण, श्रमिक संगठन, सामाजिक सुरक्षा तथा सामाजिक बीमा सम्बन्धी केन्द्रीय कानून राज्य पर लागू हुए|

ए) १९६६ में लोकसभा में प्रत्यक्ष मतदान द्वारा निर्वाचित अपना प्रतिनिधि भेजने का अधिकार दिया गया|

ऐ) १९६६ में ही जम्मू-कश्मीर की विधानसभा ने अपने संविधान में आवश्यक सुधार करते हुए- ‘प्रधानमन्त्री’ के स्थान पर ‘मुख्यमन्त्री’ तथा ‘सदर-ए-रियासत’ के स्थान पर‘राज्यपाल’ इन पदनामों को स्वीकृत कर उन नामों का प्रयोग करने की स्वीकृति दी| ‘सदर-ए-रियासत’- अभी का राज्यपाल- का चुनाव विधानसभा द्वारा हुआ करता था, अब राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा होने लगी|

ओ) १९६८ में जम्मू-कश्मीर के उच्च न्यायालय ने चुनाव सम्बन्धी मामलों पर अपील सुनने का अधिकार सर्वोच्च न्यायालय को दिया|

औ) १९७१ में भारतीय संविधान के अनुच्छेद २२६ के तहत विशिष्ट प्रकार के मामलों की सुनवाई करने का अधिकार उच्च न्यायालय को दिया गया|

क) १९८६ में भारतीय संविधान के अनुच्छेद २४९ के प्रावधान जम्मू-कश्मीर पर लागू हुए|

यह सच है कि बीते हुये २८ वर्षों में धारा ३७० का क्षरण नहीं हुआ| किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि वह हमेशा के लिये स्थित हो गई है| पं. जवाहरलाल नेहरू ने जम्मू-कश्मीर के एक नेता पं. प्रेमनाथ बजाज को २१ अगस्त १९६२ में लिखे हुये पत्र से यह स्पष्ट होता है कि उनकी कल्पना में भी कभी ना कभी धारा ३७० समाप्त होगी| पं. नेहरू ने अपने पत्र में लिखा है- ‘‘वास्तविकता तो यह है कि संविधान का यह अनुच्छेद, जो जम्मू-कश्मीर राज्य को विशेष दर्जा दिलाने के लिये कारणीभूत बताया जाता है, उसके होते हुये भी कई अन्य बातें की गयी हैं और जो कुछ और किया जाना है, वह भी किया जायेगा| मुख्य सवाल तो भावना का है, उसमें दूसरी और कोई बात नहीं है| कभी-कभी भावना ही बडी महत्त्वपूर्ण सिद्ध होती है|’’

और कुछ बिन्दू ध्यान में लेने लायक है|

१) इस धारा में ही उसके सम्पूर्ण समाप्ति की व्यवस्था बताई गयी है| धारा ३७० का उप अनुच्छेद ३ बताता है कि ‘‘पूर्ववर्ती प्रावधानों में कुछ भी लिखा हो राष्ट्रपति प्रकट सूचना द्वारा यह घोषित कर सकते है कि यह धारा कुछ अपवादों या संशोधनों को छोड दिया जाये तो समाप्त की जा सकती है|

इस धारा को एक परन्तुक (Proviso) भी है| वह कहता है कि इस के लिये राज्य की संविधान सभा की मान्यता चाहिये| किन्तु अब राज्य की संविधान सभा ही अस्तित्व में नहीं है|जो व्यवस्था अस्तित्व में नहीं है वह कारगर कैसे हो सकती है? यह भी ध्यान में लेना आवश्यक है कि धारा ३७० ही अस्थायी है| उसे चिरस्थायी नहीं बनाना चाहिये|

हम यह मानते हैं कि धारा ३७० यह कश्मीर घाटी के लोगों के लिये भावना का विषय बनी है| किन्तु जम्मू-कश्मीर राज्य के और भी दो भाग है| १) जम्मू प्रदेश और २) लद्दाख| जम्मू और लद्दाख की जनता की भावना का भी आदर करना आवश्यक है|

यह स्पष्ट है कि यह दो क्षेत्र धारा ३७० को नहीं चाहते| तो आवश्यक हो जाता है कि जम्मू-कश्मीर राज्य का त्रिभाजन हो| मतलब यह है कि जम्मू का अलग राज्य हो और लद्दाख को केंद्र शासित प्रशासन का दर्जा प्राप्त हो| यह भी ध्यान में लेना आवश्यक है कि जम्मू प्रदेश की जनसंख्या कश्मीर घाटी की जनसंख्या के बराबर है| उसका क्षेत्र तो घाटी के क्षेत्र से ११ हजार वर्ग कि. मी. अधिक है| जम्मू प्रदेश की तथा घाटी की जनसंख्या उत्तर-पूर्व के अनेक राज्यों की जनसंख्या से अधिक है| अत: आज के जम्मू-कश्मीर राज्य के तीन हिस्से बनने में कोई अनौचित्य नहीं है| फिर घाटी की जनता ३७० के अस्तित्व का आनंद ले सकती है|

मैं यह समझता हूँ कि इस सारी प्रक्रिया को पूर्ण करने में लम्बा समय लगेगा| किन्तु राज्य विधानसभा में तुरन्त कम से कम तीन कानून पारित करने चाहिये| और वह भी इस राज्य विधानसभा के चुनाव के पहले|

१) जम्मू प्रदेश में करीब ३ लाख लोग ऐसे हैं जो लोकसभा के लिये चुनाव में मतदान तो कर सकते है किन्तु राज्य विधानसभा के लिये मतदान नहीं कर सकते| मतलब है कि वे भारत के नागरिक है लेकिन जम्मू-कश्मीर राज्य के नागरिक नहीं है| यह छलावा तुरन्त समाप्त होना चाहिये|

२) कश्मीर के निर्वासित पण्डितों का पुनर्वसन हो| घाटी के बहुसंख्य मुस्लिमों को इस की शरम आनी चाहिये कि कश्मिरी पण्डित अपने परम्परागत मकानों में सुरक्षित और इज्जत के साथ नहीं रह सके| पण्डितों के साथ उनके पुनर्वसन के सम्बन्ध में तुरन्त बातचीत शुरू होनी चाहिये|

३) अन्य राज्य के समान जम्मू-कश्मीर विधानसभा का कार्यकाल भी पांच वर्ष का हो| जो अभी छ: वर्षों का है| जिसका कोई औचित्य और प्रयोजन नहीं है|

मैं आशा करता हूँ कि नई केन्द्र सरकार इस सम्बन्ध में यथा शीघ्र कदम उठाएगी|

 

-मा. गो. वैद्य

10 जून 2014

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