मा.गो.वैद्य

अपने देश में, जो ‘हिन्दुस्थान’ नाम से विख्यात था, ‘हिन्दू’ शब्द को बदनाम करने के प्रयास बड़ी ताकत से किये जा रहे हैं। आश्चर्य और लज्जा की भी बात यह है कि जिनको दुनिया ‘हिन्दू’ नाम से पहचानती है, वे लोग ही इस बदनामी मुहिम में सबसे आगे हैं। अपने देश का ‘हिन्दुस्थान’ यह नाम जानबूझकर भुलाया जा रहा है। अपने संविधान की पहली धारा की शब्दावली ही देखें। वह बताती है India that is Bharat shall be a union of States इस धारा की शब्दावली का अर्थ यह होता है कि अपने देश का मूल नाम ‘इंडिया’ है। यहां के अनपढ़ लोगों के समझ में आने के लिये उसका अनुवाद ‘भारत’ किया है। यह शब्दावली यह भी अधोरेखित करती है कि यह देश मूलत: एक नहीं है। अनेक राज्यों का वह संघ है। मतलब यहां मूलभूत इकाई ‘राज्य’ है, भारत नहीं। इस प्रकार के वैचारिक विभ्रम का मतलब यहां दिखाई  देता है कि हिमालय से लेकर सागर तक फैला यह देश एक है, ऐसा आभास तक किसी को न हो ।

vivekanand
भारत और हिन्दुस्थान हमारे माननीय संविधानकर्ताओं ने, विष्णु पुराण का एक श्लोक भी अपने संज्ञान में लिया होता, तो संपूर्ण भारत के एकत्व का बोध उनको हो जाता। वह श्लोक है-
उत्तरं यत् समुद्रस्य

हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।

वषंर् तद् भारतं नाम

भारती यत्र सन्तति:।।

श्लोक का अर्थ है– समुद्र के उत्तर में और हिमाचल के दक्षिण में जो प्रदेश है उसका नाम भारत है और वहां रहनेवाले लोग ‘भारती’ हंै। संविधानकर्ताओं ने जरा भी स्वत्व का अभिमान और आत्मविश्वास होता तो वे ….ऐसा शब्द प्रयोग करते ‘भारत’ शब्द, विष्णु पुराण के वचन के अनुसार इस देश का विस्तार बतायेगा और ‘हिन्दुस्थान’ शब्द उसका गुणात्मक आशय (…) प्रकट करेगा
धर्म और रिलिजन

हम यह मान लेंगे कि वे लोग नया संविधान बनाने की जल्दी में थे या ‘हिन्दू’ शब्द के अर्थ के जो आयाम है, उनसे वे अनभिज्ञ थे। सम्भवत: ईसाई तथा इस्लाम के समान ‘हिन्दू’ भी केवल एक मजहब है ऐसा ही वे मानते होंगे। यह बौद्घिक संभ्रम तो अभी भी विद्यमान है। वे ‘धर्म’ और ‘रिलिजन’ के अथों का भेद समझने में असमर्थ दिखाई देते हैं। ‘धर्म’ का अर्थ बहुत व्यापक है। ‘रिलिजन’ ‘धर्म’ का एक अंग मात्र है। ‘रिलिजन’ केवल परमार्थ तक सीमित है। ‘धर्म’ ऐहिक भी है और पारमार्थिक भी है। वैशेषिकों ने ‘धर्म’ की सही परिभाषा की है।
‘यतोऽभ्युदयनि:श्रेयससिद्घि: स धर्म:’ यानी जिस से अभ्युदय यानी ऐहिक उन्नति और नि:श्रेयस यानी पारमार्थिक कल्याण की सिद्घि होती है वह ‘धर्म’ है। यह वैशेषिकों की परिभाषा है। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन् ने ठीक ही कहा है कि Hinduism is not a religion, it is a common-wealth of many religions- मतलब है ‘हिन्दू’ कोई एक रिलिजन नहीं है, अनेक रिलिजनों का वह संघ है। वे आगे कहते हैं-  Hindus, if they accept the Hindu system of culture and life. Hinduism insists not on religious conformity but on a spiritual and ethical outlook of life. Hinduism is not a sect, but a fellowship of all who accept the law of right and earnestly seek for truth हिन्दू के इस व्यापक आशय की अनदेखी कर आज के हमारे नेताओं ने ‘हिन्दू’ को इस्लाम और ईसाई मत की पंक्ति में बिठाकर उसे एक संप्रदाय बना डाला है। इसलिये जो कोई ‘हिन्दू’ की बात करता है, उसे वे सांप्रदायिक, कम्युनल, संकीर्ण मानते हैं।
हिन्दू धर्म अभी अपने देश में स्वामी विवेकानंद के जन्म की सार्द्ध शती मनाई जा रही है। सम्भवत: तथाकथित सेक्युलर पार्टियों के लोग भी सार्द्ध शती समारोह मनायेंगे या दिखाने के लिये क्यों न सार्द्ध शती समारोहों में शामिल होंगे। उनके लिये तथा अन्य सभी के लिये भी स्वामी जी ने ‘हिन्दू’, ‘हिन्दू धर्म’, ‘हिन्दू राष्ट्र’ इन विषयों के सम्बन्ध में क्या कुछ कहा है, यह बताना मुझे आवश्यक लगता है। यह बात ध्यान में रखनी चाहिये कि स्वामी विवेकानंद के अमरीका तथा अन्य यूरोपीय देशों में जो भाषण हुये, वे 19वीं शताब्दी में हुए थे। उन लोगों को ‘धर्म’ शब्द का अर्थ ज्ञात होना असम्भव था। अंग्रेजी भाषा में ‘धर्म’ शब्द का सम्यक् और समग्र आशय प्रकट करने वाला शब्द ही नहीं है। क्योंकि ऐसी व्यापक अवधारणा का उनके विचार विश्व में उदय ही नहीं हुआ था। उनके बीच में भाषण करते हुये स्वामी जी ने ह्यरिलिजनह्ण शब्द का प्रयोग किया है। किन्तु उस शब्द के व्यापक आशय के बारे में उनके मन में यत्किंचित भी संदेश नहीं था। इस संदर्भ में उनके कुछ वचन ध्यान में लेने चाहिये।

1) ईसाई मत ईसा मसीह पर, इस्लाम मुहम्मद साहब पर, बौद्घ बुद्घ पर, जैन जिन पर- ऐसे ये रिलिजन व्यक्ति- आधारित हैं, लेकिन अपना धर्म व्यक्ति पर नहीं सिद्घान्तों पर आधारित है। भगवान् कृष्ण वेदों से श्रेष्ठ नहीं हैं। उनको भी वेद श्रेष्ठ लगते थे। श्रीकृष्ण का देवत्व इस में है कि उन्होंने अपने जीवन में वेदों की सर्वोत्तमता को प्रकट किया है।
2) हरेक देश की कार्य करने की एक विशेष रीति होती है। कुछ राजनीति के द्वारा प्रगति करते हैं। हमारे लिये ‘धर्म’ ही एकमात्र साधन उपलब्ध है, जिसकी सहायता से हम कुछ हलचल कर सकेंगे? हम हिन्दुओं को राजनीति भी ‘धर्म’ के द्वारा ही समझ में आयेगी, समाज शास्त्र का भी आकलन होगा तो वह भी ‘धर्म’ के द्वारा ही क्याकि ‘धर्म’ ही यहां की ओंकार ध्वनि है। अन्य सारे सुर राष्ट्रीय जीवन-संगीत के संवासुर हैं।

इससे यह स्पष्ट होगा कि ‘धर्म’  केवल उपासना का कर्मकांड नहीं होता वह जीवनव्यापी है। ‘धारणाद् धर्म इत्याहु: धर्मो धारयते प्रजा:’, यह महाभारत का सुप्रसिद्घ वचन है-‘धर्म’  प्रजा की यानी जगत में उत्पन्न सभी को धारणा करने वाला तत्व है।
अस्मिता का बोधक शब्द ‘हिन्दू’ शब्द कहां से आया? वैदिक साहित्य में उसका उल्लेख है क्या? पराये लोगों ने दिया हुआ वह अभिधान नहीं हैं क्या?- इस निरर्थक चर्चा में स्वामी विवेकानंद उलझे नहीं। उन्होंने यही बताया कि ह्यसिंधुह्ण से ह्यहिन्दूह्ण आया है। अनेक पश्चिमी तथा पूर्व भारतीय भाषाओं में ह्यसह्ण का उच्चारण ह्यहह्ण होता है। ह्यसप्ताहह्ण का ह्यहफ्ता बनता है। हम लोग ह्यअसमह्ण कहते हैं, किन्तु वहां के लोग ह्यआहोमह्ण कहते हैं। मैं एक बार असम के होजाई नगर में गया था। मेरा परिचय कराते हुए वक्ता ने कहा, ह्यये नागपुर से निकलने वाले तरुण भारत के पूर्व ह्यहम्पादकह्ण हैंह्ण। तथापि ह्यहिन्दूह्ण शब्द का मूल कुछ भी हो, वह अब हमारी विशेषता का, विशिष्टता का तथा अस्मिता का बोधक बन गया है। हमें उसका अभिमान धारण करना चाहिये। विवेकानंद कहते हैं, ह्यह्यमुझे हिन्दू कहने का अभिमान लगता है। मेरे देशबंधुओं, भगवान् की कृपा से आप को भी वैसा लगे। अपने पूर्वजों के बारे में श्रद्घा हमारे रक्त में होनी चाहिये। वह हमारे जीवन का अभिन्न अंग बने और हम संपूर्ण जगत की मुक्ति के लिये प्रयत्नशील हों।ह्णह्ण मूल अंग्रेजी वचन ऐसा है,  “I am proud to call myself a Hindu. Through the grace of the Lord, may you, my countrymen, have the same pride. May that faith in your ancestors come into your blood. May it become a part and parcel of your lives. May it work towards the salvation of the world.”

ह्यह्यहिन्दू इस शब्द पर और हिन्दू नाम धारण करने वाले हरेक व्यक्ति को हम अत्यन्त प्रेम करना सीखें । वह किसी भी प्रान्त का रहने वाला हो, कोई भी भाषा बोलने वाला हो, परिचय होते ही वह हमको अत्यंत निकटतम और प्रियतम लगे तभी हम सही अर्थ में हिन्दू कहलायेंगे।
सन् 1897 में लाहौर में दिये भाषण में स्वामी जी ने कहा- “We are Hindus. I do not use the word Hindu in any bad sense at all, nor do I agree with those that think there is any bad meaning in it. Upon us depends whether the name Hindu will stand for everything that is glorious, everything that is spiritual……….. Let us be ready to show that this is the highest word that any language can invent.” (Complete works: Vol III, Page 368)
हिन्दू राष्ट्र हिन्दू, हिन्दू धर्म, इन शब्दों के साथ ह्यहिन्दू राष्ट्रह्ण इस शब्द का भी प्रयोग स्वामी जी ने अनेकों बार किया है। अपने एक भाषण में वे कहते हैं,

“So long as they (Hindus) forgot the past, the Hindu Nation remained in a state of Stupor…………. The more the Hindus study the past, more glorious will be their future; and whoever tries to bring the past to the door of everyone, is a great benefactor to his Nation.” (Complete works, Vol IV, Page 329) और एक भाषण में वे कहते हैं- ह्यह्यहमारी आत्मा हमारे धर्म में है उस आत्मा का कोई विनाश नहीं कर सका। अत: यह हिन्दू राष्ट्र अभी भी जीवित है“Because no one was able to destroy, therefore the Hindu Nation is still living.” (Complete works: Vol IV, Page 157)

मद्रास (आज का चेन्नई) में ‘रंॅी२ ङ्मा कल्ल्रिं’ इस विषय पर बोलते हुये उन्होंने कहा- The sages of India have been almost innumerable; for what has the Hindu Nation be doing for thousands of years except producing sages? (Complete works: Vol III, Page 248)
आज कल अपने देश मे ह्यराष्ट्रह्ण और ह्यराज्यह्ण इन दो अवधारणाओं के संबंध में भ्रांतियां नजर आती हैं। वस्तुत: ह्यराज्यह्ण (२३ं३ी) यह राजनीतिक व्यवस्था है ऐसी व्यवस्था कि जो कानून द्वारा और कानून के बल पर चलती है। उस कानून के पीछे दण्डशक्ति खड़ी होती है। ह्यराज्यह्ण आवश्यक है, इसमें संशय नहीं, किन्तु ह्यराज्यह्ण अलग है ह्यराष्ट्रह्ण अलग है। ह्यराष्ट्रह्ण यानी लोग होते है ढीङ्मस्रह्णी ं१ी ३ँी ठं३्रङ्मल्ल. जो अपने देश को मातृभूमि मानते हैं, ह्यवन्दे मातरम्ह्ण कहते हुए जिनका सीना अभिमान से  फूलता है, जिनको अपने पूर्वज और अपना इतिहास फिर वह विजय का हो या पराजय का हो, अपना लगता है, और सब से प्रधान बात यह है कि जिनका अच्छा-बुरा नापने के मापदण्ड समान होते हैं, यानी जिनकी मूल्यधारणा श्ंह्ण४ी-२८२३ीे समान होती है, उनका राष्ट्र बनता है। यह मूल्यधारणा यानि संस्कृति होती है।  ऐसे कौन से लोग हैं जिनके मन में उपरि निर्दिष्ट भावनाओं का अस्तित्व है? उनका नाम ह्यहिन्दूह्ण है। इसलिये यह ह्यहिन्दू राष्ट्रह्ण है। ह्यराष्ट्रह्ण और ह्यराज्यह्ण इन अवधारणाओं के मौलिक भेद की अनदेखी कर, कई लोग बोल जाते हैं कि 15 अगस्त 1947 को नया राष्ट्र बना। वस्तुत:, उस दिन नये राज्य का आविर्भाव हुआ राष्ट्र तो अति प्राचीन काल से विद्यमान है।
परावर्तन
इस राष्ट्र का हिन्दू मुख्य प्रवाह है। उन हिन्दुओं को हिम्मत के साथ खड़ा होना चाहिये, विस्तार की आकांक्षा रखनी चाहिये और जगद्गुरु का पद प्राप्त करना चाहिये, ऐसी स्वामी जी की इच्छा थी। किसी भी कारण से हो स्वधर्म छोड़कर अन्य मत-पंथों में गये लोगों को फिर से हिन्दू धर्म में लाएं यह प्रश्न पूछे जाने पर उन्होंने कहा था ह्यअवश्य लाना चाहिए।ह्ण कुछ समय स्वामी जी स्तब्ध रहे और फिर उन्होंने कहा ह्यऐसा हुआ नहीं तो हमारी संख्या कम होगी। परधर्म में गए लोगों को वापस लाने की हमारी मानसिकता चाहिए और उस दिशा में पहल चाहिये।
पुरुषार्थ संपन्न बनें

विवेकानंद जी ने समग्र हिन्दू समाज की एकता को अधोरेखित कर, अनेकों बार कहा है कि समाज के हर व्यक्ति को पुरुषार्थ के साथ खड़ा होना चाहिये। अरे भाई, दिन-रात जयकार कर यही प्रार्थना कर कि, ह्यहे जगतजननी, मुझे पुरुषार्थ का दान दे, ह्यहे शक्तिदेव, मेरी दुर्बलता का विलय कर, मेरी क्लीबता नष्ट कर मुझे पौरुष संपन्न कर’।