धीर जी ने म्यांमार में चमत्कार कर डाला: डा. कृष्ण गोपाल

नई दिल्ली. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डा. कृष्ण गोपाल ने म्यांमार में संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्री राम प्रकाश धीर को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि उन्होंने वहां हिंदू और बौद्ध समाज के साथ एकात्मभाव विकसित करने का चुनौतीपूर्ण कार्य करने में मिली सफलता चमत्कार से कम नहीं है.

Sradhanjali Sabha at Keshav Kunj- Shri Ram Prakash Dheer ji
डा.कृष्ण गोपाल ने झण्डेवाला स्थित संघ कार्यालय ‘केशव कुंज’ में आयोजित श्रद्धांजलि सभा मंं कहा कि कि श्रीमान रामप्रकाश जी धीर 1947 से लेकर के 2014 तक वहां प्रचारक रहे. उनका प्रचारक जीवन कुछ समय यहां, कुछ समय वहां, ऐसा जरूर रहा. 65-66 वर्ष तक प्रचारक जीवन वहां उनका चला, संघ की योजना से वे म्यांमार गये, उस समय की वहां की परिस्थितियों में उन्होंने काम खड़ा किया. एक बड़ी कठिनाई यह थी कि म्यांमार का भूगोल अधिकांश पहाड़ी है. एक से दूसरी जगह जाने में असुविधा तब भी बहुत होती थी और आज भी होती है. इस तरह के देश में, उस परिस्थिति में वहां पर रहना, वहां के समाज में एक स्थान बनाना, वैचारिक दृष्टि से उस सारे समाज को अपने साथ जोड़ना, यह कठिन काम था. सबसे बड़ी बात यह है कि भारत की पूर्वी दिशा में जिसको पहले बर्मा कहते थे, आज हम म्यांमार बोलते हैं, वहां बहुसंख्या में बौद्ध हैं. बौद्धों और हिन्दुओं का आपसे में सम्बन्ध क्या है, इस पर सारा काम निर्भर था.
डा कृष्ण गोपाल ने कहा कि पिछले 200 वर्षों मे यहां पर जो ब्रिटिशर्स रहे, उन्होंने यहां यही कोशिश की कि सम्पूर्ण हिन्दू समाज को जितने छोटे-छोटे टुकड़ों में बांट सकते हैं, बांट कर अलग-अलग रखो. बौद्ध हिन्दू नहीं हैं और हिन्दू बौद्ध नहीं हैं, दोनों के बीच बड़ा भारी अंतर है, एक वेदांतिक परंपरा है और एक अवैदिक परंपरा है इस मान्यता को ब्रिटिशर्स ने गहराई से स्थापित करने की कोशिश की. लेकिन बौद्ध धर्म के जानकार बुद्धिजीवी जानते हैं कि भगवान बुद्ध जीवन भर हिन्दू ही रहे. उन्होने अपने जीवन में कभी नहीं कहा कि मैं हिन्दू धर्म या सनातन धर्म या वैदिक धर्म छोड़कर के कोई दूसरा धर्म या दूसरा मत-सम्प्रदाय पैदा कर रहा हूं, ऐसा उन्होंने कभी नहीं कहा. उनका जन्म एक क्षत्रिय परिवार में हुआ, विवाह क्षत्रिय से हुआ, बेटा क्षत्रिय था. धीरे-धीरे उन्होंने एक साधना की परंपरा विकसित की. सारे दुख का निवारण कैसे हो सकता है, इस परंपरा में वे आगे बढ़े. करुणा, प्रेम, दया, ममता यह तो सारे हिन्दू धर्म के एक वैदिक धर्म के प्राण तत्व हैं. हां, कुछ कर्मकांडों से वह दूर गये. कुछ प्रश्नों के उत्तर उन्होंने इसलिये नहीं दिये क्योंकि इन प्रश्नों को लेकर विवाद खड़ा होता था. ईश्वर है कि नहीं है, आत्मा है कि नहीं है आदि-आदि प्रश्नों का ऐसा उत्तर देना सम्भव नहीं, जिस पर सभी एकमत हो जायें. इसलिये बुद्ध इस पर शांत रहे.
सह सरकार्यवाह ने कहा कि धीर जी के समक्ष यह बड़ी चुनौती थी कि म्यांमार के बौद्ध स्वयं को विराट हिन्दू समाज का ही एक अंग मानें. हम परम्परा से कौन हैं, यह बातें ध्यान से उन्होंने बताईं. हिन्दू विभाजनकारी नहीं है, यह विचार उन्होंने वहां के लोगों के बीच रखा. हिन्दू का एक मौलिक सिद्धान्त है कि यह सारी पृथ्वी के लोगों के बीच विभाजन नहीं करता, हिन्दू ऐसा कभी नहीं कहता कि तुम्हारी जो पूजा पद्धति है-वह नरक में ले जाने वाली है और हमारी जो पूजा पद्धति वाले स्वर्ग में जायेंगे. उन्होंने म्यांमार के लोगों से कहा कि क्या आप ऐसा बोलते हों तो उन्होंने कहा हम बौद्ध भी ऐसा नहीं बोलते, हम लोग भी ऐसा बोलते हैं कि अच्छा काम करने वाले सब लोग स्वर्ग में जायेंगे, होता है स्वर्ग तो सब लोग स्वर्ग में जायेंगे. पूजा के आधार पर हम लोग भेद नहीं करते. ऐसा मानने वाले सब हिन्दू ही हैं. वहां के लोगों को जब यह दर्शन समझ में आया तो धीरे-धीरे जो सनातन परम्परा का, वैदिक परम्परा का जो मौलिक तत्व है वह हिन्दू है या बौद्ध है, वह शैव है या वैष्णव है, वह मौलिक तत्व उनकी समझ में आया. जिस तरह विचार उन्होंने उनके सामने रखा, वह लोगों को समझ में आ गया. भगवान बुद्ध ने कब कहा था कि तुम मेरी बात नहीं मानोगे तो तुम नरक में जाओगे, यह कभी नहीं कहा, बुद्ध ने कब कहा था कि जो मैं बता रहा हूं, वही सच है, बाकी सब झूठ है. इन सब बातों को बहुत अच्छे प्रकार से वहां के लोगों के मन में उन्होंने बैठा दिया. यह एक चमत्कारिक काम था, बिना कुछ बोले, बिना कोई संघर्ष किये सारे समाज के अन्दर एक एकात्मक दृष्टि पैदा करने का काम उन्होंने किया.
डा. कृष्ण गोपाल ने कहा कि प्रचारक जीवन के जिस संकल्प को लेकर धीर जी वहां गये थे, उसका अंतिम सांस तक उन्होंने निर्वाह किया. वहां के सारे समाज में उन्होंने अुकूलता उत्पन्न की. वैदिक परम्परा को मानने वाले अनेक लोग वहां खड़े कर दिये, कार्यकर्ता खड़े कर दिये और उस वृत के साथ वह चले गये. संघ के बारे में, हिन्दू समाज के बारे में, हिन्दू दृष्टि के बारे में, हिन्दू परम्परा और दर्शन के बारे में सारे म्यांमार में सम्मान का भाव जगाने का काम उन्होंने किया. अत्यंत विपरीत परिस्थितियों में वे चाहे भौगोलिक, राजनीतिक, वैचारिक हों, उन्होंने अच्छा संदेश वहां दिया. विशेषतौर पर उन्होंने भारत-म्यांमार सीमा पर बड़ी संख्या में होने वाले ईसाई धर्मांतरण के बारे में म्यांमार को समझाने में सफल रहे. इसी कारण म्यांमार सरकार ने चर्च पर अनेक प्रतिबंध लगाये.
श्री श्याम परांडे ने म्यांमार में उनके के कार्य के बारे में बताया कि हिन्दू बौद्ध में एक आपसी सहमति बनाने का श्रेय श्री धीर जी को है. उन्होंने महात्मा गौतम बुद्ध के जीवन पर एक प्रदर्शनी बनाई तब बर्मा की सरकार ने उनकी पूरी तरह से मदद की, संरक्षण दिया और यह आग्रह किया कि यह प्रदर्शनी बर्मा के सभी शहरों में जाये. यह प्रदर्शनी वहां पर खूब लोकप्रिय हुई, बाद में, वह थाईलैंड में भी लगाई गई वहां भी यह लोकप्रिय हुई, इस तरह वहां हिन्दुओं और बौद्धों के बीच आपसी सहमति बनी.
श्रद्धांजलि सभा के समापन पर दो मिनट का मौन रखा गया बाद में शांति मंत्र का उच्चारण किया गया.